दोहरे मानक से रजत मानक तक
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जैसा कि श्री कैसल्स ख्1, ने बताया कि तीन वर्ष बाद कागजी मुद्रा कुल धातु-मुद्रा का लगभग 6 प्रतिशत तक बनाई गए जो उस समय श्री विलसन द्वारा पौंड स्टर्लिंग में 100,000,000 का अनुमान लगाया गया था और उन्होंने दस लाख स्टर्लिंग या सारे का 1 प्रतिशत तक की देश की पुनरसेत्पादक पूंजी के निर्मुक्त करने के प्राथमिक उद्देश्य की वास्तव में पूर्ति की। अमरीकी कपास के स्थान पर भारत की कपास की मांग लिवरपूल में बढ़ गई, इस कपास का निर्यात गृह युद्ध के दौरान बंद हो गया था, इस प्रकार विदेशी व्यापार का काफी अनुपात हो गया। चूंकि कागजी मुद्रा ने कोई राहत नहीं दी अतः सारा बोझ चांदी पर पड़ा। फिर भी चांदी का उत्पाद उतनी तीव्रता से नहीं हो रहा था। जितना पहले हुआ था और भारत में उसकी खपत मद्धिम नहीं हुई थी। अतः मुद्रा-माध्यम की अपर्याप्तता काफी महसूस हुई जैसी कि अपर्याप्तता पहले महसूस की गई थी चाहे कागजी मुद्रा ही प्रारंभ क्यों न की गई हो। सोने का अधिक मात्रा में आयात ही नहीं किया गया परंतु उसका मुद्रा संबंधी प्रयोजनों के लिए उपयोग किया गया यद्यपि यह विधिमान चलार्थ नहीं थी। यह तथ्य बम्बई चैम्बर ऑफ कॉमर्स ख्2, द्वारा भारत सरकार के सामने लाया गया। इस बारे में निवेदन किया गया कि भारत में स्वर्ण-मुद्रा जारी की जाए। यह बात कही गई।
‘‘स्वर्ण निर्मित मुद्रा बनाने की प्रवृत्ति बढ़ती जाती है परन्तु इस देश के लोग
मौजूदा चांदी की मुद्रा के दोषों के अपरिष्कृत उपचार में लगे हैं’’
और
‘‘सोने की छड़ों पर बम्बई के बैंकों की मुहर लगा दी गई है और इस प्रयोजन
के लिए उन्हें देश के अनेक भागों में परिचालित किया जा रहा है।’’
इससे एक आंदोलन उत्पन्न हुआ जिससे सरकार से यह अपेक्षा की कि पेपर करेंसी एक के उपबंध को कार्यान्वित किया जाए और इस आंदोलन ने ऐसा स्वरूप धारण कर लिया जिसने सरकार के हाथ बांध कर रख दिये। इस अवसर पर इस परिवर्तन को प्रभावकारी करने के लिए योजना के बारे में साहसपूर्वक विचार किया गया। सर चार्ल्स ट्रेवेलियन ने इस उपबंध के कमजोर पक्षों को अच्छी तरह समझ लिया और इस हेतु सरकार को कार्य करने के लिए कहा गया उन्होंने तर्क दिया कि कागजी मुद्रा देश के परिचालित सिक्कों में ही देय थी और जो भारत में चांदी का रुपया था तथा उस सुरक्षित सोने के भंडार के भाग को रखना था जो नोटों के भुगतान के लिए
- देखिए 1 जनवरी, 1864 के बंबई सरकार को लिखा उनका पत्र, इन्ट्रोडक्शन ऑफ गोल्ड इन इंडिया।
भारत में सोने का प्रादुर्भाव से संबंधित लेख, पृष्ठ 51-69
- रिपोर्ट ऑफ दि बाम्बे चैम्बर ऑफ कॉमर्स, 1863-64 एप्ीपी 1, पृष्ठ 206