1. दोहरे मानक से रजत मानक तक - Page 67

52 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

‘‘कि विशेष अवसरों पर तथा विशेष लेन-देन के मामलों में सौदागर समुदाय

के लिए यह जानना अधिक लाभदायक होगा कि सोने को निर्धारित दर पर मुद्रा

के रूप में उपलब्ध किया जा सकता है। दूसरी ओर यदि निर्धारित दर पर सोने

ने परिचालन में प्रवेश नहीं किया तो इससे यह सिद्ध होगा कि सुरक्षित और

परिवर्तित परंतु इसमें संदेह नहीं है कि श्री लैंग ने इसे स्वर्ण मानक में परिवर्तित

करने के लिए सरल उपाय के रूप में देखा। उन्होंने 7 मई 1862 के मुद्रा तथा

बैंकिंग संबंधी कार्यवृत में लिखाःµ

‘‘इस उपबंध का उद्देश्य यही था कि सोने के भावी उपयोग के संबंध में सावधानीपूर्वक और अस्थायी तौर पर प्रयोगों के लिए द्वार खुले रखे जाएं। सोने का आयात पहले ही से विद्यमान है और यह बढ़ रहा है तथा स्थानीय जनता इस धातु की बहुत प्रशंसा करती है जिसके कारण सामान्य तौर पर यह अधिमूल्य पर है..... इस प्रकार इस समय के बाद यदि सोने का उपभोग आम हो जाता है और इसका मूल्य स्थिर हो जाता है तब कुछ अन्य कदम उठाए जा सकते हैं। और ऐसा लगता है कि उस समय के राज्य सचिव का यही विचार रहा होगा क्योंकि उन्होंने सोने की तुलना में कागजी मुद्रा जारी किए जाने के पक्ष में सिफारिश के बल को समझा कि भारत में स्वर्ण-मुद्रा का प्रारंभ किये जाने से प्रभावकारी योगदान होगा।’’ ख्1,

परंतु चाहे सौदागर समुदाय के लिए राहत के रूप में विचार किया गया हो अथवा स्वर्ण-मुद्रा के प्रारंभ किए जाने के लिए कोई मार्ग प्रशस्त करना हो, इस उपबंध को कार्यान्वित नहीं किया गया। राज्य सचिव ने इसके संबंध में की गई किसी भी कार्रवाई पर आपत्ति की। ख्2, इसी बीच कागजी मुद्रा रामबाण सिद्ध नहीं हुई जैसा कि प्रण किया था। जहां तक यह पहुंच पायी वह अर्थव्यवस्था प्रभावित हुई, वह नगण्य था।

­तालिका VI

कागजी मुद्रा का विस्तार और अर्थव्यवस्था

महाप्रान्त­ सर्राफा­ सिक्का­ सरकारी परिचालित

प्रतिभूतियां­ नोटों का

मूल्य­

31 अक्टूबर, 1863 को कलकत्ता­ ---­ 18,455,922­ 11,044,078­ 29,500,000­

31 अक्टूबर, 1863 को मद्रास­ --­ 7,300,000­ --­ 7,300,000­

3 जनवरी, 1864 को बंबई­ 117,000,000­ 19,000,000­ --­ 23,600,000­

जोड़­ 177,000,000­ 37,655,922­ 11,044,07860­ 400,000­

  1. 16 सितम्बर, 1862 के सेक्रेटरी ऑफ स्टेट डिस्पैंच संख्या 158 पैरा 59

  2. देखिए उनकी डिस्पैच का पैरा 64 सुमरा