दोहरे मानक से रजत मानक तक
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वैध नहीं माना जा सका और इससे राजनीतिक अविश्वास अथवा वाणिज्यिक संत्रास के समय उनकी परिवर्तनीयता को गंभीर खतरा था। ख्1,
अतः उन्होंने आंदोलन की सीमा के परे साहसिक कार्य किया और यह घोषित किया कि सोने को बजाय पीछे के दरवाजे से मुद्रा के अन्दर प्रवेश कराने के इससे अधिक श्रेयस्कर यह होगा कि सोने को भारत में मूल्य का मानक बनाया जाना चाहिए। वे श्री विल्सन के उस विचार से सहमत नहीं थे कि यदि स्वर्ण के मानक के स्थान पर चांदी का मानक स्वीकार कर लिया जाए तो इससे ‘‘ऋणदाता का विश्वास भंग हो जाएगा।’’ परंतु वे इस तथ्य से भी अपने इरादे में पीछे नहीं हटे कि चांदी की मुद्रा को सहायक स्थिति में जाने के पूर्व भारत में सोने की मुद्रा के प्रारंभ से कुछ समय के लिए दोहरा स्तर स्थापित हो जाएगा क्योंकि उन्होंने यह तर्क दिया कि ‘सभी देशों को दोहरे स्तर की परिवर्तनशील अवस्था में से अवश्य गुजरना चाहिए। इससे पूर्व कि वे एकाकी स्तर पर आएं। तदनुसार उन्होंने यह सुझाव दिया कि (1) ब्रिटिश अथवा आस्ट्रेलिया के मानक के सोवरन और आधा सोवरन को भारत में 10 रुपये का एक विधिमान्य चलार्थ मानना चाहिए। (2) सरकारी कागजों की मुद्रा विनिमय के लिए थी तो रुपया से या सोवरन 10 रुपया प्रति सोवरन की दर से होनी चाहिए किन्तु वे सोने चांदी के विनिमय के लिए नहीं होने चाहिए।
उनके सुझावों को भारत सरकार ने स्वीकार कर लिया तथा उन्हें राज्य सचिव ख्2, की स्वीकृति के लिए भेज दिया गया। परंतु राज्य सचिव एकल धातु पद्धति से न हटने के लिए अधीर-अशांत थे उन्होंने बड़ी अशिष्टता से इस समग्र परियोजना को छोड़ दिया। उनका उत्तर तर्क ख्3, का विकृत रूप है तथा भयानक रूप से छिछला है। वे इन सुझावों को स्वीकार करने के लिए अनिच्छुक थे क्योंकि वे इस बात से संतुष्ट थे कि एक सोवरन की मूल्य 10 रुपये रखने से सोवरन की दर को कम करना बहुत बड़ी बात थी जिससे उसने परिचालन की अनुमति नहींदी जा सकती। यही वह स्थिति थी जिससे वह ठोस आधार पर खड़ा था। भारत की टकसाल में सोवरन को बनाने
- देखिए 20 जून, 1864 को उनका कार्यवृत भारत में सोना (गोल्ड इन इंडिया) पर लेख आदि पृष्ठ 147ः
यहां तक कि वे कागजी मुद्रा सुरक्षित रिजर्व में चांदी के सर्राफे को बनाए रखने के लिए विरोधी थे
क्योंकि इससे मुद्रा विभाग पर यह दायित्व था कि चांदी के सिक्के ढाले जाएं जिसमें समय लगता था
क्योंकि उस समय भारत की टकसालों की सीमित क्षमता पर भी ध्यान दिया जाना चाहिए था जबकि
जारी किए गए कागजी मुद्रा की मांग के अनुसार सिक्कों में देय थे। कागजी मुद्रा विभाग में इसकी
अधिक मांग थी जबकि सिक्के की दृष्टि से पूर्ति कम थी।
- देखिएµभारत सरकार (गवर्नमेंट ऑफ इंडिया) का डिस्पैच संख्या 89, शिमला, दिनांक 14 जुलाई,
1864
- सेक्रेटरी ऑफ स्टेट से फाइनेंशियल डिस्पैच, संख्या 224, दिनांक 26 सितंबर, 1864