56 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
की लागत का अनुमान ख्1, उस समय 10-4-8 रुपये था, जबकि इंग्लैंड से कलकत्ता को उसके निर्यात का अनुमान 10-9-10 रुपये था और आस्ट्रेलिया से उसके आयात अनुमान 10-2-9 रुपये था। चाहे कोई भी उचित दर क्यों न हो, सोवरन 10 रुपये प्रति सोवरन की दर से परिचालित नहीं हो सकता था। वह खेद का विषय था कि सर चार्ल्स ट्रेवेलियन ने उच्च अनुपात का सुझाव नहीं दिया ख्2, ताकि सोवरन के परिचालन को आश्वस्त मामला बनाया जा सकता। परंतु राज्य सचिव फिर भी इस सुझाव के उतने ही विरोधी रहते यहां तक कि यदि राज्य सचिव के लिए प्रतिकूल अनुपात पर आधारित सुझाव व्यर्थ था। परन्तु यदि यह अनुकूल अनुपात पर आधारित होता, यह कुछ कम अहितकर नहीं था क्योंकि इसने उस संभावना का पूर्वाभास दिया जिसके बारे में वे इस दोहरे मानक की सबसे अधिक त्रुटिपूर्ण पद्धति समझते थे चाहे यह कितनी ही अस्थायी क्यों न हो। मात्र द्विधातु पद्धति की संभावित वापसी राज्य सचिव को डराने के लिए यथेष्ट थी। क्योंकि उन्होंने जिसके कारण इस सारी बात को स्वीकार करने से इनकार कर दिया था कि, यह सार्वजनिक लाभ के लिए हितकर होगा कि दोहरे मानक की अवधि में से होकर जाया जाए जिससे मुद्रा के आधार को चांदी से सोने में परिवर्तन किया जाए। राज्य सचिव केवल यही एक रिआयत देने को तत्पर थे उन्होंने इस बात की अनुमति ली कि ‘‘सोने के सिक्के को सरकार द्वारा निर्धारित दर और सार्वजनिक रूप से की गई घोषणा द्वारा लोक खजानों में प्राप्त किया जा सकता है बिना इसे भारत में वैध चलार्थ बनाए। यह स्मरणीय है कि यह उस मूर्खतापूर्ण कानून की पुनरावृति थी जिसे 1852 में छोड़ दिया गया था क्योंकि उससे सरकार को लज्जित होना पड़ा था। ऐसे सिक्के को प्राप्त करने के प्रस्ताव जिसकी कीमत आप अदा न कर सकते हों यह एक मुसीबत मोल लेना था और परियोजना के अंतर्निहित सुविचारित खतरे की रोकथाम करने की दृष्टि से अधिक परिपक्व सुझाव प्रस्तावित किया गया था।
परन्तु मुद्रा का अभाव इतना अधिक था कि भारत सरकार अपने विचार पर हठपूर्वक चिपके रहने के बजाए राज्य सचिव के सुझाव को मानने को राजी हो गई
- देखिएµमाननीय क्राउड ब्राउन से माननीय सर सी.ई.ट्रेबेलियन को पत्र कलकत्ता दिनांक 28 मई, 1864
देखिए सोने के संबंध में लेख आदि पृष्ठ 265
- उन्होंने 10ः1 के अनुपात को क्यों स्वीकार किया दूसरा कारण था कि भारत में उस समय परिचालित
बाजार भाव का अनुपात था उनका तर्क यह था कि ‘‘सोवरिन को भारत में परिचालन के लिए दरबद्ध
किया जाना चाहिए परन्तु इसका संदर्भ इंगलिश-सोवरिन से न दिया जाए और उसका सदर्भ चांदी की
अनुमानित भारत के मूल्य पर किया जाए।’’ शायद वे सोवरिन की अधिक दर बनाने से इच्छुक नहीं
थे क्योंकि उनको डर यह था कि ‘‘वर्तमान भारतीय मुद्रा में शीघ्र ही आमूल परिवर्तन हो जाएगा और
ऋणदाताओं को अपने देय की तुलना में बहुत कम प्राप्त होगा।’’ देखिएµभारत में स्वर्ण पर आलेख
आदि। 23 नवम्बर, 1864 का उनका कार्यवृत्त।