अध्याय दो
रजत मानक और इसकी सममूल्यता का
विस्थापन
यह स्पष्ट है कि जिस प्रकार मुद्रा के क्रमिक विकास की प्रक्रिया रजत (चांदी) मानक की स्थापना की पराकाष्ठा पर पहुंची और जिस प्रकार स्वर्ण मुद्रा के लिए जो आंदोलन था उसका अंत कागजी मुद्रा के अनुपूरक के साथ रजत मानक में हुआ। इस प्रकार की मिश्रित व्यवस्था की कार्यशैली की जांच से पूर्व, यह उपयुक्त होगा कि संक्षिप्त में इसकी संरचना की प्रकृति का सर्वेक्षण कर लिया जाए।
इस मुद्रा के धातु संबंधी भाग का नियमन सन् 1870 को 23 वे अधिनियम के अंतर्गत किया गया था। इसके अंतर्गत प्राधिकृत और विधिसम्मत सिक्कों का विवरण आठवीं तालिका में दर्शाया गया है।
इस अधिनियम में टकसालों द्वारा जारी किए गए सिक्कों की संख्या अथवा उनकी विधिमान्य मुद्रा के अधिकारों (शक्तियों) के बारे में कई भी नवीनता नहीं दिखाई गई है। सिक्कों के मामले में पूर्व अधिनियमों के बिल्कुल ठीक वैसा ही यह अधिनियम रहा, ख्1, इसके विधिक उपबंधों को इस प्रकार बनाया गया कि देश के मुद्रा कानून को वह एक आदर्श कानून बना दे। जैसा कि इससे पूर्व कभी नहीं किया गया था। इसने जिन पूर्व अधिनियमों को निरस्त कर दिया वे टकसाल ‘‘उपचारात्मक’’ अथवा
- इसे आगे दिए गए विवरण से समझा जाए-
(क) सोने के सिक्के-( i ), ( ii ) और ( iii ), एक्ट XVII, 1835 की धारा VII द्वारा प्राधिकृत किए गए
थे। समेकित अधिनियम, 1870 द्वारा केवल ( IV ) को बढ़ाया गया।
(ख) चांदी के सिक्के ( i ), ( ii ) और ( iii ) एक्ट XVII 1835 की धारा I द्वारा प्राधिकृत किए गए इस
अधिनियम ने चांदी का सिक्का जारी करने के लिए प्राधिकृत किया और इस सिक्के को ‘‘दोहरा
रुपया’’ कहा गया परन्तु इसे 1862 के अधिनियम ( XIII ) की धारा II द्वारा हटा दिया गया। (ग) तांबे के सिक्के ( i ), ( ii ) और ( iv ), सर्वप्रथम 1835 के अधिनियम XXI की धारा I द्वारा प्राधिकृत
किया गया और बाद में 1844 के अधिनियम XXII द्वारा समग्र भारत के लिए उसे व्यापक बनाया
गया। सिक्का संख्या ( iii ) 1854 के अधिनियम XI की धारा II द्वारा परिचालित किया गया।