62 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
‘‘सहनशीलता’’ के सिद्धांतों को बहुत मान्यता देते थे इसका विषय प्रमुख रूप से केवल टकसाल की तकनीकी का माना गया है। ऐसा ही है, परंतु ऐसा नहीं कि इसमें मुद्रा संबंधी विशिष्टता निहित न हो जब बहुमूल्य पदार्थ भार द्वारा परिचालित थे तब टकसाल की सहनशीलता का प्रश्न संभवतः नहीं उठ सकता था क्योंकि यह प्रत्येक व्यक्ति यह तोलकर उसका तोल मालूम कर सकता था और उसकी कीमत भी आंक सकता था परन्तु सिक्कों के आविष्कार के बाद, जब मुद्रा एक किंवदती के रूप में आई प्रत्येक व्यक्ति ने यह विश्वास किया है कि सिक्कों का वास्तविक मूल्य वही था जो सिक्कों पर प्रमाणित किया गया था। फिर भी सिक्के का वास्तविक मूल्य सदैव प्रमाणित मूल्य से पूर्ण मेल नहीं खा सकता। इस प्रकार के अंतर का होना अवश्यंभावी है और सिक्के ढालने की कला में निपुणता के होते हुए भी इस अंतर को टालना कठिन है। यह महत्वपूर्ण बात है कि वास्तविक टकसाल के मानक से इतना कितना विचलन हुआ है। अतः सभी देशों के टकसाल संबंधी कानूनों में ऐसे उपबंध होते हैं जो यह घोषित करते हैं कि सिक्कों को उनके प्रमाणित मूल्य पर विधिमान चलार्थ नहीं माना जाएगा यदि उनमें निश्चित सीमा से परे उनके वैध मानक में कोई भूल हो जाती है। वास्तव में सिक्कों को उनकी सह्य सीमा को निर्धारित किए बिना विधिमान्य चलार्थ की मान्यता देना धोखा-धड़ी की खुली छूट देना है। जहां तक अधिनियम ने उन सिक्कों की सह्य सीमा निर्धारित की सिक्कों को टकसाल से जारी करने की उसने अनुमति दी और अपने में एक हितकारी कदम था। फिर भी यह खेद की बात है कि इस अधिनियम में ऐसी कोई प्रक्रिया का उल्लेख नहीं किया गया जिससे इस बात की पुष्टि की जाए कि सिक्का ढालने का कार्य विधि सम्मत था। ख्1, अधिनियम द्वारा दूसरा महत्वपूर्ण सुधार था, स्वतंत्र रूप से ढालने के सिद्धांत को स्वीकार करना। इस सिद्धांत को इतनी मान्यता नहीं दी गई जितनी कि वह इसका अधिकारी था। यह ठोस मुद्रा का आधार सिद्धांत है। जिसमें समुदाय के लेन-देन के लिए आवश्यक मुद्रा की मात्रा की गणना के मुख्य प्रश्न का सीधा सम्बन्ध है। इस मात्रा को व्यवस्थापित करने के दो खुले रास्ते कहे जा सकते हैं। एक रास्ता तो यह है कि टकसाल को बंद कर
- यह प्रक्रिया इंग्लैंड में उपलब्ध कराई गई है और इसे ‘‘ट्राइल ऑफ दि पाइक्स’’ के नाम से पुकारा
जाता है। इसकी स्थापना तथा इसके कार्यों के लिए देखिए-1866 के सी. रिटर्न 203 का एच. ईस्ट
इंडिया कंम्पनी के शासन काल में भारतीय सिक्कों की शुद्धता का मानक सदैव ही कोर्ट ऑफ डायरेक्टर
का सबसे गहन चिन्ता का विषय रहा। भारतीय टकसाल के सिक्के नियमित रूप से इंग्लैंड भेजे गए
जहां उनकी जांच विशेष रूप से ‘‘ट्रायल ऑफ दि पाइक्स’’ से की गई और उसकी रिपोर्ट भारत की
टकसाल के मालिकों को मार्गदर्शन के लिए भेजी जाती रही। देखिए 1849 की सी. रिपोर्ट का एच. 1
कम्पनी के समापन के समय से ऐसी कोई प्रक्रिया नहीं है कि टकसाल के मालिकों को दोषी करार
दिया जाए।