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रजत मानक और इसकी सममूल्यता का विस्थापन

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के रिजर्व की आवश्यकता होती है। इस प्रकार रिजर्व के रूप में अधिकांश निधि रुक जाने के कारण और बट्टे के लिए उनके संसाधन बहुत कम रहते हैं। परंतु उनकी स्थिति ऋणदाता के रूप में और भी अधिक कमजोर हो गई क्योंकि बैंक से निकाली गई नकदी तीव्र गति से उनको वापिस नहीं मिली। इसका परिणाम यह हुआ कि भारतीय बैंक अपने रोकड़ व उधार खाते के बीच उचित अनुपात रखने के लिए काफी सीमा तक अपने बट्टे कम करने पर बाध्य हो गए जबकि यह स्थिति अंग्रेजी बैंकों की नहीं थी। इस संबंध में बैंकिंग की शाखा का अभाव एक महत्वपूर्ण अभीष्ट वस्तु रही परंतु यदि बैंक की शाखा भी होती तो भी बैंक से निकाली राशि वापिस नहीं आ सकती थी क्योंकि इसे व्यापार की चालू धाराओं में नहीं छोड़ा गया था। इसे सरकारी खजानों में बंद कर दिया गया था जिनकी कार्यविधि देश के बैंकिंग लेन-देन प्रक्रिया से स्वतंत्र थी। यद्यपि मूल रूप से सरकार द्वारा स्वतंत्र रूप से खजाना चलाने में किसी प्रकार की गलती नहीं थी और यदि इसकी क्रिया विधि व्यापार समुदाय की क्रिया निधि के साथ अंतिम चरण में सामंजस्य स्थापित कर लेती तो इसमें किसी प्रकार की हानि होने की आवश्यकता नहीं पड़ती परंतु भारतीय

खजाने की कार्यशैली व्यापार की आवश्यकताओं के प्रतिकूल रही इसने उस समय निधि को बंद कर लिया जबकि उसे इसको मुक्त करना चाहिए था और निधि को उस समय मुक्त कर दिया जब उसे इस निधि को बंद करना था। भारतीय मुद्रा को बाजार के ऐंठन का कारण ऋण माध्यम का लचीलेपन का अभाव था तथा स्वतंत्र

खजाना प्रणाली, जहां तक वे देश के अंदर मुद्रा आपूर्ति को प्रभावित करने के प्रमुख घटक हैं (देखिए चार्ट I ) बट्टे की दर के ऐसे ऐंठन के बुरे दुष्प्रभावों को शायद ही बढ़-चढ़ कर बताया जा सकता है। ख्1, उधार ली गई पूंजी की किसी भी अर्थव्यवस्था में प्रत्येक व्यापारी को विश्वास करना चाहिए चाहे वह पूरे वर्ण की न होकर कुछ ही मौसमों में क्यों न हो, लाभ की सीमा यकायक वृद्धि से मिट सकती है अथवा कम व्यापार या अधिक व्यापार के बट्टे की दर में यकायक कमी हो जाने के कारण बढ़ सकती है। इस प्रकार के उतार-चढ़ाव व्यापार के खतरे बढ़ा देते हैं, व्यापार के व्यय को अधिक कर देते हैं तथा उपभोक्ता के लिए अधिक लागत हो जाती है। वे मूल्यों उतार-चढ़ाव लाते हैं। सट्टेबाजी को प्रोत्साहित करते हैं तथा संत्रास उत्पन्न करते हैं। यदि इस प्रकार की बात है कि भारत में व्यापार समुदाय पर पड़ी इन मुसीबतों का निराकरण करने की दिशा में कोई गंभीर कदम नहीं उठाए गए। कागजी मुद्रा में सुधार अथवा स्वतंत्र खजाना पद्धति के उन्मूलन से इस स्थिति में सुधार आ सकता था यद्यपि दोनों में ही सुधार अधिक अच्छा था। जन साधारण इस बात का इच्छुक नहीं था कि कागजी मुद्रा ख्2, में परिवर्तन किया जाए परंतु स्वतंत्र खजाने के उन्मूलन

  1. अमरीकी अनुभव के लिए देखिए µई.डब्ल्यू. केमेटोर,‘‘सीजनल वेरिएशन्स इन दि न्यूयार्क मनी मार्केट’’

दि अमेरिकन इकोनॉमिक रिव्यू, मार्च 1911

  1. देखिए इंडिया इन 1880 लेखक सर रिचार्ड टेम्पल पृष्ठ 469, सर चार्ल्स बुडः एडमिनिस्ट्रेशन ऑफ

इंडियन अफेयर्स, पृष्ठ 89 µदेखिएµदि इंडियन स्टेट्समैन, 15 जनवरी (1884)