2. रजत मानक और इसकी सममूल्यता का विस्थापन - Page 91

76 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

चैक पद्धति को नहीं अपना सकते थे क्योंकि भारतीय बैंक सिवाय अंग्रेजी के किसी अन्य भाषा के माध्यम से अपना काम करने से इन्कार कर दिया करते, इसके अलावा चैक पद्धति की वृद्धि इस बात को मानकर चलती है कि वहां बैंकों का विशाल जाल फैला हुआ है और यह एक ऐसी शर्त है जो भारत में पूरी कदापि नहीं हो सकती। बैंक की सुविधा के अभाव में चैक इस्तेमाल के लिए सबसे बुरा औजार है। यदि यह चैक निश्चित सीमा-अवधि में प्रस्तुत नहीं किया जाता तो यह चैक बेकार और मूल्यहीन हो जाता है तथा इसलिए धन-संग्रह के रूप में नोट की अपेक्षा अधिक घटिया हो जाता है। इस प्रकार की परिस्थितियों में यह कोई आश्चर्य की बात नहीं है कि भारत में चैक पर्याप्त रूप से बड़े पैमाने पर व्यापार में नहीं आए ताकि वे नोटों के अलचीलेपन में सुधार कर सकें।

परन्तु यदि भारतीय बैंक नोटों की अपेक्षा ऋण के उपयोग को इसी स्वरूप में काम में लाने में सफल हो जाते तो वे उस सीमा तक मुद्रा-बाजार को सहज नहीं बना पाते जैसा कि अंग्रेजी बैंक ऐसा करने में सफल हुए हैं। बैंकिग का एक कार्य यह है कि बैंक का दायित्व है कि मांगने पर नकद राशि दी जाए। यदि बैंकों में जमा राशि नकदी में जमा की जाती है तो इस दायित्व के निभाने में कोई खतरा नहीं है। वास्तव में बैंकों में अधिकांश जमा ऐसी हुंडियों के द्वारा होती है जिनका नकदी में भुगतान करना वे अपना कर्तव्य समझते हैं इसलिए बैंकर के लिए सबसे प्रथम बात जो बैंकर को देखनी होती है वह है नकदी जमाओं व उसके ऋण जमा का अनुपात। अब यह अनुपात विपरीत रूप से प्रभावित हो सकता है चाहे उसके ऋण जमा में वृद्धि हो अथवा नकदी जमा में कमी हो । इन दोनों अवस्थाओं में से किसी भी अवस्था में उसकी नकदी के भुगतान की क्षमता उसके कुल दायित्वों के अनुपात में कुल नकदी को कम करने से अंशतः कमजोर बना देती है। ऋण के अनुचित विस्तार के विरुद्ध बैंकर प्रभावकारी ढंग से अपनी रक्षा कर सकता है। परन्तु चैक पद्धति का विकास कुछ भी क्यों न हुआ हो फिर भी यह सदैव डर की संभावना बनी रहती है कि किसी न किसी समय कुछ राशि निकाल ली जायेगी। इसलिए एक बैंकर को कुछ न्यूनतम धन अपने हाथ में सुरक्षित रखना चाहिए। कितना धन अलग से सुरक्षित रखा जाए या कितना नकदी निकाली जाने की संभावनाओं पर आधारित है। बात यह है कि जिस सीमा तक धन अलग से सुरक्षित रखा जाता है उस सीमा तक बैंक की शक्ति ऋण देने में कम हो जाती है। यदि बैंक के रिजर्व पहले ही न्यूनतम हैं तो बैंक को बट्टा देना बंद कर देना चाहिए अथवा अपने खजाने से आहरित नकदी की पुनः प्राप्ति द्वारा अपनी स्थिति मजबूत करनी चाहिए। अब यह स्पष्ट है कि यदि आहरित राशि उस चालू व्यापार के लिए रखी जा सकती है जो बैंकों को प्राप्त हो सकता है तो वे शीघ्र ही फिर अपनी स्थिति को मजबूत कर सकते हैं और न्यूनतम रिजर्व के खतरे से भली-भांति अपने को अलग कर सकते हैं परंतु उन्हें मुद्रा बाजार की आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए सदैव तत्पर रहना चाहिए। इस दृष्टिकेण से भारतीय बैंकों की क्या स्थिति रही? चैक-पद्धति के अभाव के कारण नकदी के बैंकों से निकालने की संभावनाएं बढ़ जाती हैं और इसके फलस्वरूप अधिक राशि