रजत मानक और इसकी सममूल्यता का विस्थापन
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के लिए चिन्तित था। दूसरी ओर सरकार ने स्वतंत्र खजाना पद्धति को समाप्त करने से मना कर दिया ख्1, और व्यापारी समुदाय को ऐसे कुछ अनिश्चित तर्क पर सहायता करने के नैतिक दायित्व से इंकार करते हुए कहा गया है कि मुद्रा के बंद करने से पूंजी को बंद ख्2, नहीं किया गया है।
यह कहना भी संभव नहीं कि नीति की व्याख्या करने के लिए नहीं कहा गया कि कागजी मुद्रा अधिनियम को कहां तक संशोधित किया जा सकता है ताकि इस स्थिति में राहत मिले। फिर भी इसके पूर्व कि इस विवादास्पद समस्या के संतोषजनक महत्व के रूप में मुद्रा पद्धति में वह लचीलापन दिया जाता जिसकी उसको आवश्यकता है, एक अन्य विशाल अवगुण उत्पन्न हो गया जिसने धातु मुद्रा के प्रतिरूप को इस हद तक प्रभावित किया कि वह मूल्य की सशक्त स्थिरता और स्थायित्व को नष्ट करने में सक्षम हो। जो इसे वरदान के रूप में देना आश्चर्य है। यह अवगुण इतना अधिक हो गया और इसके प्रभाव इतने व्यापक रहे कि अन्य सभी बातों को छोड़कर सबका ध्यान इसी पर केन्द्रित हो गया।
देश के आंतरिक लेन-देन में अलग-अलग यूनिटों के बीच मूल्य-निर्धारण में अपनी मुद्रा का जो महत्व है, वही आंतरिक लेन-देन में विनिमय की समता का मूल्य है। किन्ही दो देशों के बीच विनिमय की समता से एक-दूसरे के लिए अपनी-अपनी मुद्राओं की तुलनात्मक विनिमय मूल्यों की अभिव्यक्ति होती है। इससे यह स्पष्ट होता है कि दो देशों के बीच विनिमय की समता स्थायी होगी यदि वे उसी धातु को
- फिर भी इस बात पर ध्यान दिया जाना चाहिए कि 1862 और 1876 की मध्यावधि में प्रेसीडेंसी बैंकों
के मुख्यालयों तथा शाखा कार्यालयों सहित कुछ केन्द्रों में स्वतंत्र खजाना पद्धति स्थगित रखी गई। नोट
जारी करने के अधिकार से हानि के फलस्वरूप प्रेसीडेंसी बैंकों को एक्ट XXIV, 1861 के अनुसार
किए गए समझौतों के अंतर्गत सरकार द्वारा कुछ रियायत दी गई। रियायतों में एक रियायत थी सरकारी
शेषों का बैंकों द्वारा उपयोग 1862 के प्रथम समझौते ने सरकारी शेषों के संबंध में आगे दी गई विशेष
सुविधाएं बैंकों को दींः (1) सभी मुद्राओं और शेषों के लिए समझौते के होते हुए भी बैंक ऑफ बंगाल
के संबंध में 75 लाख, बैंक ऑफ बाम्बे के बारे में 40 लाख और बैंक ऑफ मद्रास के लिए 15 लाख
तक की सीमा को बैंकिंग प्रयोजनों के लिए बिना किसी रोकटोक से उपयोग किया गया। (2) जब
कभी मांग की गई हो तब उत्पाद के लिए एक अलग सुरक्षित कमरे में इन राशियों से अधिक राशि के
निपटारे का विकल्प अथवा उन्हें सरकारी कागज मुद्रा में निवेश करने अथवा अन्य प्राधिकृत प्रतिभूतियों
के रूप में निवेश की शक्ति इस शर्त पर आधारित होगी कि बैंक सभी समय में उस समय के अतिरिक्त
रोकड़ शेष के लिए सरकार के प्रति उत्तरदायी होंगे। (3) सरकार के ऐसे अंतर की राशि पर ब्याज
का अधिकार होगा जो वास्तविक शेष और बैंक ऑफ बंगाल के संबंध में 50 लाख, बैंक ऑफ बंबई
के बारे में 30 लाख और बैंक ऑफ मद्रास के लिए 10 लाख रुपये का अंतर होगा’’ जब कभी इन
न्यूनतम राशि से इन बैंकों के शेष कम हो जाते हैं। (4) बैंकों को अपनी शाखाओं में सरकारी शेषों
के उपयोग करने के लिए समान शर्तों अनुमति मुख्यालय के समझौतों के अनुसार प्रत्येक मामले में
उपयुक्त सीमाएं निर्धारित होंगी। इन समझौतों के किए जाने के एक वर्ष बाद बैंक ऑफ बंगाल के साथ
कठिनाई उत्पन्न हुई जिसने निधियों को इस सीमा तक बंद कर दिया कि वह उन सार्वजनिक शेषों पर
सरकारी मांगों को पूरा करने में असमर्थ रहा। इसलिए 1863 में समझौतों के संशोधन के बारे में विचारों
का आदान-प्रदान प्रारंभ किया गया और 2 जनवरी, 1866 को संशोधित समझौते कार्यान्वित किए गए।
उन्होंने सार्वजनिक शेषों के लिए आगे दिए गए उपबंध बनाएः (1) सरकार द्वारा यह वचन दिया गया