2. रजत मानक और इसकी सममूल्यता का विस्थापन - Page 95

80 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

काम में लाएं जो मानक मुद्रा के रूप में उपयोग में आती है ताकि सर्राफे के रूप में निर्मित योग्य तथा मुक्त भाव से परिवर्तनशील हो क्योंकि उस दिशा में आम माध्यम के रूप में मूल्य का साधन बने और जिसके मूल्य में कोई अंतर न आए। यदि दो देशों के बीच अपने वाहनांतरण की लागत अथवा सोना-चांदी की किस्मों में वाणिज्य की स्वतंत्रता हो। दूसरी ओर दो देशों के बीच कोई भी निर्धारित विनिमय की समता नहीं हो सकती जिनमें अपने मूल्य के मुद्रा-मानकों के रूप में अलग-अलग धातुएं हों। उस स्थिति में उनके विनिमय का प्रबंध सोने और चांदी के संबंधित मूल्यों द्वारा किया जाता है और उन्हें अपने मूल्य के संबंध में परिवर्तनों द्वारा आवश्यक रूप से घटते-बढ़ते रहना चाहिए। उनके बीच उतार-चढ़ाव के विनिमय की सीमा इतनी विस्तृत अथवा संकुचित होगी कि दोनों धातुओं के संबंधित मूल्यों में उतार-चढ़ाव की सीमा हो सकती है। इसलिए जब दो देश यथा इंग्लैंड और भारत उनके धातु-मानकों के अंतर द्वारा अलग-अलग किए जाते हैं तो सैद्धांतिक रूप से ऐसी कोई संभावना नहीं लगती कि उनके बीच विनिमय की स्थायी समता की कोई संभावना हो सके। परंतु वास्तव

कि बैंकों को अपने मुख्यालयों में बैंक ऑफ बंगाल में 70 लाख, बैंक ऑफ बंबई में 40 लाख और

बैंक ऑफ मद्रास में 25 लाख तक ‘‘औसत रोकड़ शेष’’ रखा जाएगा जिसकी सुविधा से प्ूर्ति की जा

सकती है। (2) बैंकों को यह अनुमति दी गई कि वे बैंकिंग प्रयोजनों के लिए उनके पास जमा कुल

शेषों का उपयोग करें। (3) सरकार से ब्याज का अधिकार जब बैंक ऑफ बंगाल, बैंक ऑफ बंबई

तथा बैंक ऑफ मद्रास के मुख्यालयों से सरकारी शेष क्रमशः 45 लाख, 25 लाख और 20 लाख की

न्यूनतम राशि से कम हो जाए। (4) कुछ समय के लिए बैंकिंग प्रयोजनों के लिए शाखाओं के सभी

शेषों के उपयोग की अनुमति दी गई किन्तु शर्त यह थी कि प्रत्येक शाखा को सर्वथा सरकारी शेषों की

सीमा तक सरकार के ड्राफटों को पूरा करने के लिए तैयार होना चाहिए।

संशोधित समझौते 1 मार्च, 1874 तक लागू रहे । 1874 में प्रेसीडैंसी बैंकों के चार्टरों के संशोधन का

प्रश्न विचाराधीन था और सरकार का यह उद्देश्य था कि बैंकों का यह अधिकार जारी रखा जाए ताकि

वे समग्र सरकारी शेषों का उपयोग कर सकें। ठीक इसी समय 1874 में बैंक ऑफ बंबई के साथ

कठिनाइयां उत्पन्न हो गइंर् और सरकार अपने शेषों को प्राप्त न कर सकी। इससे सरकारी शेषों को बैंक

के शेषों के साथ मिलाने की नीति पर फिर से विचार करना प्रारंभ हुआ और बैंकों के अधिपत्य में इन्हें

सौंप दिया गया। कुछ लंबे विचार-विमर्श के बाद भारत सरकार स्वतंत्र ट्रेजरी पद्धति की ओर फिर से

मुखरित हई जिसमें उन प्रेसीडैंसियों के मुख्यालयों पर रिजर्व खजाने स्थापित किए गए जहां प्रेसीडेंसी

बैंकों द्वारा धारित पिछले सरकारी शेष रखे गए। इस घटना के लिए इतिहास देखा जाए। देखिए-1864

के हाउस ऑफ कामन्स रिटर्न 109 और 505 जे.पी. ब्रुन्येते एन एकाउट ऑफ द प्रेसीडैंसी बैंक्स,

अध्याय VII

  1. फिर भी चार्ट से ऐसा लगता है कि 1873 से पूर्व रुपया स्टर्लिंग विनिमय बिल्कुल भी स्थायी न था।

परंतु इन दोनों के बीच उतार-चढ़ाव के लिए बिल्कुल ही अलग कारक बताए जाते हैं। इस बात पर

ध्यान दिया जाना चाहिए कि ईस्ट इंडिया कंपनी के समय भारतीय मुद्रा को स्टर्लिंग में परिवर्तित करने

के लिए विनिमय की दरें कई प्रकार की थी । इसके अलावा विनिमय किए सिक्कों के आंतरिक मूल्य

के साथ उनका इतना कम संबंध था कि सरकारी तौर पर दी गई वास्तविक दरें वास्तविक बाजार की

दरों से अलग थी। इस रोचक विषय को समझने के लिए देखिए 1931-32 के सैशनल पेपर्स 735 II]

का एच. विनिमय की उन दरों के संबंध में पत्र व्यवहार आदि जिन पर भारत की मुद्राएं स्टर्लिंग में

परिवर्तित की जाती है। इस बारे में अनुलग्नक संख्या 20 देखा जाए, टकर एच. सेंट जार्ज रिमकिस ऑन

द प्लान्स ऑफ फाइनेन्स, 1821 और उसी लेखक द्वारा पैसिम एंड मैमोरियल्स ऑफ इंडियन गवर्नमैंट

पृ.382-85