रजत मानक और इसकी सममूल्यता का विस्थापन
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में स्थिति चाहे कुछ भी क्यों न हो इन दोनों देशों के धातु-मानकों का अंतर कुछ भी क्यों न रहा हो, इंग्लैंड और भारत में विनिमय की दर शायद ही ख्1, एक रुपये के लिए 1 शिलिंग 10 ½ पैंस की साधारण दर से कमी ख्2, अलग हुई हो। 1873 तक दर इतनी अधिक स्थिर थी कि कुछ ही लोग इस तथ्य से सचेत थे कि दोनों देशों में अपने अलग-अलग मुद्रा मानक थे फिर इस सामान्य समतुल्यता से रुपये-स्टर्लिंग विनिमय में यकायक अस्थिरता आ गई और इससे जो विस्थापन उत्पन्न हुआ, वह अतिविशाल और अव्यवस्थित था (चार्ट II ) की किसी को भी यह पता नहीं लगा कि इसका अंत कहां होगा।
रुपये-स्टर्लिंग विनिमय वास्तव में सोने-चांदी विनिमय का ही प्रतिबिम्ब था।
- 6 मई, 1875 के प्रेषण-पत्र में स्वतंत्र खजाना-पद्धति की स्थापना की स्वीकृति की गई। अतः राज्य
सचिव द्वारा चेतावनी इस प्रकार दी गई थी, समुदाय की बचतों के प्रतिनिधित्व करने वाली पूंजी से कहीं
अलग सरकार द्वारा पूर्ति की गई पूंजी एक ऐसा संसाधन है जिसके कार्य-निष्पादन पर कोई विश्वास
नहीं किया जा सकता और इसलिए व्यापारियों को भयानक वचनबद्धता की ओर अग्रसर करता है।
इससे कुछ समय के लिए राहत मिलती है और ऐसी समृद्धि जागृत होती है कि वह किसी घटना पर
निर्भर है। एक राजनैतिक आवश्यकता यकायक आकस्मिक संसाधनों और उस वाणिज्य का दोहन करती
है जो उस पर विश्वास करते थे और वे स्वयं में रिजर्व खजानों की स्थापनाओं से परे बंधक होते हैं
जिनकी पूर्ति अपने ही संसाधनों से की जाती है। रिजर्व खजानों की स्थापना की ओर अग्रसर 1876 के
समझौतों के अधीन सरकार पूर्ववत् इस बात पर सहमत हुई कि वह बैंकों को ब्याज की भुगतान उस
समय करेगी जब बैंकों के अपने शेष किसी न्यूनतम सीमा से कम रह जाएं। सरकार ने अधिकतम राशि
के संबंध में किसी प्रकार का कोई औपचारिक करार नहीं किया और बैंकों को यह समझने के लिए
कहा ‘‘कि सरकार साधारणतया आगे दी गई राशियों से अधिक राशि अस्थायी रूप से अलग बैंकों के
मुख्यालयों के लिए नहीं छोड़ोंगी बैंक ऑफ बंगाल सौ लाख, बैंक ऑफ मद्रास तीस लाख और बैंक
ऑफ बम्बई पचास लाख। परंतु यह शर्त करार में शामिल नहीं की जाएगी जो सरकार पर ऐसा कोई
दायित्व आरोपित नहीं करेगा कि बैंकों के साथ कोई भी शेष छोड़े जाएं...... सरकार ऐसा कोई करार
नहीं करेगी कि बैंकों को सभी सार्वजनिक शेष का एकमात्र अधिपत्य बैंकों को दिया जाए जहां सरकार
बैंकों पर भरोसा करती है। ऐसे शेषों की राशि का प्रश्न जो सरकार इस प्रकार के समाधान के सामान्य
दौर बैंकों के साथ रखे, ऐसी राशि का प्रश्न ही ऐसा मार्ग है जो बैंकों को सहायता करने के लिए है
ताकि समसामयिक मांगों की प्ूर्ति की जा सके और यह बात रिजर्व खजानों में रखे हुए अपने शेषों के
लिए प्रेसीडैंसी बैंकों को ऋण देने के लिए थी। 1900 के बाद बैंक दर पर सीमित राशि के ऐसे ऋणों
को तैयार करने के लिए सहमति हुई। 1913 तक केवल 6 ऋण दिए गए। इससे यह प्रतीत होता है
कि ऋण देने की शर्तें दूभर थीं। 1913 के चैम्बरलेन कमीशन ने स्वतंत्र खजाना-पद्धति के उन्मूलन की
तुलना में ऋणों की सिफारिश की। फिर भी युद्ध ने घटनाओं का चक्र चलाने में शीघ्रता की। इससे
प्रैसीडैंसी बैंकों और सरकार के बीच सहयोग की आवश्यकता सिद्ध हुई तथा वृहद और शक्तिशाली
बैंकिंग संस्था की आवश्यकता पर जोर दिया गया। इसके साथ ही प्रेसीडैंसी बैंकों का इम्पीरियल बैंक
ऑफ इंडिया (एक्ट XLVII, 1920) के साथ विलय द्वारा यह सफलता प्राप्त की गई जिसके प्रारंभ
होने के साथ ही स्वतंत्र खजाना पद्धति फिर से उन्मूलन की प्रक्रिया के अंतर्गत आ गई। 1876 के बाद
स्वतंत्र खजाने की घटनाओं के इतिहास के लिए देखिए इन्टैरिम रिपोर्ट ऑफ दि चैम्बरलैन कमीशन के
अनुलग्नक, खंड I, 1913 के सी.डी. 7070, संख्या I और II
यह सामान्य ही है यदि सोने और चांदी के बीच सामान्य अनुपात 15 ½ ः 1 माना जाए जो लगभग 70
वर्ष तक बना रहा।