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रजत मानक और इसकी सममूल्यता का विस्थापन

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इसलिए जब यह कहा जाता है कि 1873 से पूर्व रुपया स्टर्लिंग 1 शिलिंग 10 ½ पैंस तक ही स्थायी था तो इसका केवल यही अर्थ था कि 1873 से पूर्व सोने-चांदी का विनिमय का अनुपात 1ः15 ½ था और 1873 के बाद रुपये-स्टर्लिंग के अनुपात में अव्यवस्था आ गयी जिसका अर्थ यह था कि सोने-चांदी के विनिमय ने अपने पुराने बंधनों को खो दिया। इसलिए प्रश्न उठता है कि 1873 के बाद सोने और चांदी के बीच विनिमय के अनुपात में इतनी उथल-पुथल क्यों हुई जितनी उस वर्ष से पूर्व नहीं थी? उस समय ऐसा विचित्र कार्य लगा कि उसकी पर्याप्त व्याख्या के लिए दो पहलुओं की अपील की गई। उनमें से एक पहलु विश्व के प्रमुख देशों द्वारा मानक मुद्रा माध्यम के रूप में चांदी का विमुद्रीकरण था। चांदी के विमुद्रीकरण के पक्ष में यह आंदोलन भार, माप और सिक्कों की एकरूपता के लिए भोलेभाले विद्रोह का परिणाम था। जहां तक विद्रोह का उद्देश्य ऐसी एकरूपता के स्थापित करने से था, यह प्रत्येक प्रकार से उपयोगी था परंतु इससे यह उदाहरण मिलता है कि उच्च उद्देश्यों की प्राप्ति की दिशा में अग्रसर होते हुए यदा कदा अपने पीछे बुराइयों की परंपरा भी छूट जाती है। 1851 में लंदन में एक विशाल प्रदर्शनी के आयोजन के अवसर पर विभिन्न प्रदर्शित वस्तुओं की तुलना करने में बहुत बड़ी कठिनाई उत्पन्न हुई इसका मुख्य कारण था विभिन्न देशों द्वारा लाए गए तोल, माप और सिक्कों के अंतर के कारण प्रदर्शित वस्तुओं को उस प्रदर्शनी में एकत्रित अलग-अलग राज्यों के प्रतिनिधियों ने स्पष्ट रूप से देखा। ख्1, भार, माप और सिक्कों को अंतर्राष्ट्रीय एकता के प्रश्न पर इस प्रदर्शनी में एकत्रित विभिन्न वैज्ञानिक सम्मेलनों द्वारा चर्चा की गई और यद्यपि इसका कोई ठोस परिणाम न निकल पाया फिर भी इस प्रश्न को कार्य-सूची से अलग नहीं किया गया। दो वर्ष बाद आयोजित ब्रूसेल्स इंटरनेशनल इस्टैटिस्टिकल कांग्रेस (ब्रूसेल्स स्थित अंतर्राष्ट्रीय सांख्यिकीय कांग्रेस) में यह प्रश्न फिर से उठाया गया। इस संबंध में जनमत आगे बढ़ चुका था कि पेरिस में आयोजित अगली सांख्यिकीय कांग्रेस ने एक घोषणा जारी की जो 1859 में आयोजित वियाना स्थित सांख्यिकीय कांग्रेस द्वारा पुष्ट की गई और इसमें इस बात की आवश्यकता पर अधिक बल दिया गया कि अलग-अलग देशों के भार, माप और सिक्कों की वांछित एकरूपता लाई जाए। ख्2, इंग्लैंड की उस कार्रवाई से प्रोत्साहित होकर जिसमें उसने 1862 में भार और माप को मीट्रिक पद्धति में ऐच्छिक बना दिया था, बर्लिन की 1863 की अंतर्राष्ट्रीय सांख्यिकीय कांग्रेस ने विभिन्न सरकारों को आमंत्रित करने का निश्चय किया कि वे अपने प्राधिकृत विशेष कांग्रेस प्रतिनिधियों को इसमें भेजें ताकि वे इस बात पर विचार करें और रिपोर्ट भेजें कि सोने और चांदी के सिक्कों में तुलनात्मक भार क्या होना चाहिए और ऐसे विवरण तैयार करें जिनके द्वारा अलग-अलग देशों में मुद्रा पद्धतियां नियत की जाएं

  1. रिपोर्ट ऑफ दि रायल कमीशन आन इंटरनेशनल कायनेज 1868 पृष्ठ V

  2. देखिए रसल एच.बी. इंटरनेशनल मानेटरी कॉन्फरेंसिस 1898 पृष्ठ 18-25