84 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
और जिनके आधार पर दशमलव प्रणाली के अनुसार एकाकी यूनिट का उपविभाजन किया जा सके। ख्1, इस कांग्रेस के महत्व की अनदेखी नहीं की जा सकती है। इसने हटकर एक नई दिशा दी। इससे पूर्व कांग्रेस के अधिवेशनों में भार और माप की एकरूपता के बारे में अधिकांशतया विचार-विमर्श किया जाता था परंतु इस कांगेस में वह पहलू सिक्कों की एकरूपता के अधीन ही नहीं वरन अलग-अलग कर दिया। ख्2, यद्यपि यह प्रस्ताव भिन्न प्रकार का था फिर भी इसके गंभीर परिणामों को झेलना नहीं पड़ता यदि सिक्कों की एकता के प्रश्न तक ही सीमित रखा जाता। लेकिन एक ऐसी परिस्थिति आई जिसने मुद्रा के प्रश्न को भी अपने अधिकार क्षेत्र में ले लिया। जब समान सिक्कों का विद्रोह आगे बढ़ा तो फ्रांस की सरकार ने स्वाभाविक रूप से यह इच्छा व्यक्त की कि उनके सिक्कों की पद्धति को एकरूपता के हित में यूनियन से बाहर अन्य देशों में भी आदर्श के रूप में स्वीकार किया जाना चाहिए क्योंकि उनकी सिक्का-पद्धति पहले ही लेटिन यूनियन द्वारा समेकित क्षेत्र में लागू हो चुकी थी। इस उद्देश्य की दृष्टि से फ्रांसिसी सरकार ने उस समय की ब्रिटिश सरकार से इस बारे में निवेदन किया परंतु इसके उत्तर में यह कहा गया कि ब्रिटिश सरकार इस प्रस्ताव पर तब तक विचार नहीं कर सकेगी जब तक कि फ्रांस एकल सोने के मानक को स्वीकार न कर ले। ख्3, इस प्रस्ताव पर हतप्रभ होने के स्थान पर उस समय फ्रांस सरकार इंग्लैंड की सद्भावना प्राप्त करने के लिए इतनी अधिक आतुर थी कि उसने पूर्ण आत्म तुष्टि से ब्रिटिश की उस पूर्वापेक्षा को स्वीकार करने में जरा भी हिचकिचाहट महसूस नहीं की और वास्तव में उसने निर्धारित मार्ग से हट कर 1867 में जब पेरिस में सम्मेलन आयोजित किया गया तो उसने वास्तव में सभा में यह प्रयत्न किया ख्4, कि ऐसा प्रस्ताव पारित किया जाए जिसका संबंध ‘‘समरूप अंतर्राष्ट्रीय सिक्का के लिए यह आवश्यक था कि केवल सोने को ही विश्व की प्रमुख मुद्रा होना चाहिए।’’ सिक्के की समरूपता के प्रश्न को इतना अधिक महत्व दिया गया कि जिन लोगों ने प्रस्ताव पारित किया था, उन लोगों ने वह ध्यान नहीं दिया कि उन्हें इसकी उपलब्धि के लिए कितना त्याग देना पड़ेगा। शायद यह कहना अधिक ठीक होगा कि उन्हें यह पता नहीं था कि वे अपने निर्णय से विश्व की मुद्रा पद्धति को प्रभावित कर रहे हैं। उन सभी ने यह विचार किया कि वे सिक्के की समरूपता को प्रोन्नत कर रहे थे और उससे अधिक नहीं ख्5, परन्तु इस निर्णय की मजबूरी के कारण कुछ भी क्यों न
रसल द्वारा उद्धृत सामने का उद्धरण पृष्ठ 25
रसल उद्धरण।
देखिए µप्रोफेसर फॉक्सवैल का साक्ष्य, प्रश्न 23, 976 रायल कमीशन आन एग्रीकल्चरल डिप्रेशन इन
इंग्लैंड 1892
इसके लिए देखिएµरसल, सामने का पृष्ठ 46
हॉलैंड के प्रतिनिधि डॉक्टरमीज के संबंध में माननीय विकला बनाया जाना चाहिए जिन्होंने इस प्रस्ताव
से होने वाली हानि की ओर ध्यान आकर्षित किया।