ब्राह्मण बनाम शूद्र
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खड़ा हो गया और निवेदन किया मैं ब्राह्मणों को दिए गए राजधर्म का पालन कर रहा था अर्थात निस्सहाय की रक्षा और शत्रुओं का दमन और याचना की जो मांगेगे उसे मुंह मांगा दान देंगे चाहे सोना, पुत्र, स्त्री शरीर, जमीन, राज्य और पुण्य लाभ ही क्यों न हो। विश्वामित्र ने संपूर्ण राज्य मांग लिया, जिसमें राजा का शरीर, उनकी स्त्री और पुत्र न थे। राजा ने सहर्ष देना स्वीकार किया। मुनि ने कहा - ‘‘सब आभूषण उतार दो और अपनी स्त्री और पुत्र को बल्कल वसन धारण करा कर राज्य के बाहर निकल जाओ।’’ जब राजा जाने लगे, तब विश्वामित्र ने राजसूय यज्ञ कराने की दक्षिणा मांगी। राजा ने कहा, ‘‘इस शरीर, स्त्री और पुत्र के अतिरिक्त मेरे पास क्या है?’’ इस पर राजा ने एक मास का समय मांगा और प्रजा को विलाप करते छोड़कर काशी चले गए। विश्वामित्र ने भी वहां पहुंच मास समाप्त होने से पहले ही अपनी दक्षिणा मांगी। तब शैव्या ने राजा से कहा,- ‘‘मुझे बेच दो।’’ राजा बेहोश हो गए और रानी भी बेहोश हो गई। विश्वामित्र उनको होश में लाए। दक्षिणा मांगी और कहा - ‘‘सूर्यास्त से पहले दक्षिणा न मिली तो शाप दे दूंगा। राजा ने अपने को धिक्कराते हुए अपनी स्त्री को बेच दिया। एक धनी ब्रह्माण ने उसे दासी के तौर पर खरीद लिया। लड़का भी ‘‘मां’’ कहता अपनी मां के साथ चला गया। रानी ने आग्रह पर ब्राह्मण ने लड़के को भी खरीद लिया। राजा विश्वामित्र के पास आए और जो कुछ स्त्री और पुत्र के मूल्य में पाया उन्हें दे दिया। विश्वामित्र इतने कम धन से संतुष्ट न हुए, तो राजा ने अपने को भी बेचने को कहा। तब धर्म चांडाल का रूप धारण कर आए और राजा को खरीदना चाहा। राजा सूर्यवंशी होने के कारण चांडाल का नीच काम करने को तैयार न हुए और विश्वामित्र से कहा - ‘‘आप स्वयं मुझे दास के तौर पर खरीद लीजिए।’’ विश्वामित्र ने कहा - ‘‘अच्छा यदि ऐसा है तो तू मेरा दास है और मैं तुझे एक लाख मुद्राओं के बदले चांडाल को बेचता हूं।
चांडल सहर्ष यह धन चुकता कर देता है और दुःखी हरिश्चन्द्र को अपने निवास स्थान पर ले जाता है। चांडाल उसे श्मशान जाकर कफन चुराने का काम करने के लिए कहता है। वह बताता है कि इससे उसे 2/6 भाग प्राप्त होगा जो उस (चांडाल) का होगा और 1/6 भाग राजा को मिलेगा। राजा ने इस भयानक क्षेत्र में नीच कर्म करते हुए बारह वर्ष व्यतीत किए जो उसे सौ वर्षों के बराबर लगे। वह जब सो जाता तो उसे अपने जीवन के विषय में अनेक स्वप्न आते हैं। जब वह जागा तब उसकी पत्नी अपने पुत्र का अंतिम संस्कार कराने आई, जो सर्प दंश से मर गया था। पहले तो पति पत्नी ने एक दूसरे को नहीं पहचाना, क्योंकि उनकी आकृति कष्ट सहते-सहते विकृत हो गई थी। हरिश्चन्द्र ने उसके विलाप से तुरंत पहचान लिया कि वह उसकी पत्नी ही है, जो दुर्भाग्य की मारी हुई है। वह बेहोश हो जाता है। रानी भी उसे पहचान लेती है, वह भी बेहोश हो जाती है। जब उनकी मूर्छा भंग होती है तब वे दोनों रोने लगते हैं। पिता अपने पुत्र की मृत्यु पर और रानी अपने