अध्याय 9. ब्राह्मण बनाम शूद्र - Page 139

124 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाड्ख्.,मय

पर पूर्ण होता है। जब मैंने कन्या का अपहरण किया तो सातवीं भांवर नहीं पड़ी थी, तथापि सर्व धर्मों के ज्ञाता वशिष्ठ ने मेरा समर्थन नहीं किया। अतएव सत्यव्रत वशिष्ठ से रूष्ठ थे। यद्यपि वशिष्ठ का आचरण धर्मानुकूल था। सत्यव्रत को राजा की आज्ञा से जो मौनव्रत धारण कराया गया था, उसका उद्देश्य भी उसकी समझ में नहीं आया। राजा ने यह काम कुल मर्यादा के लिए किया था। महामुनि वशिष्ठ ने ऐसा करने से राजा को नहीं रोका और इसके बजाए उसके पुत्र को राजा बनाने का निश्चय कर लिया। सत्यव्रत ने बारह वर्ष का प्रायश्चित पूरा कर लिया और जब खाने के लिए कोई मांस न रहा, तो भूख, मूर्खता और क्रोधवश उसने वशिष्ठ की कामधेनु गाय को जो सब इच्छित पदार्थों को देने वाली थी, मार डाला और उसका मांस स्वयं खाया और विश्वामित्र के लड़के को भी खिलाया। इससे क्रोधित होकर वशिष्ठ ने उसका नाम त्रिशंकु रख दिया, क्योंकि उसने तीन पाप किए थे। चूंकि त्रिशंकू ने विश्वामित्र की स्त्री की मदद की थी इसलिए वे इस पर कृपालु हो गए ख्1, ।

उन्होंने उससे वरदान मांगने को कहा। त्रिशंकु ने कहा, कि ‘‘मैं सशरीर स्वर्ग जाना चाहता हूं। जब बारह वर्ष की अनावृष्टि का अंत हुआ, तो विश्वामित्र ने त्रिशंकु को राजगद्दी पर बैठाकर यज्ञ कराया तथा देवताओं और वशिष्ठ के विरोध करने पर उसे संदेह स्वर्ग पहुंचा दिया।’’

दूसरा किस्सा त्रिशंकु के पुत्र हरिश्चन्द्र का है। यह विष्णु पुराण तथा मार्कण्डेय पुराण में लिखा है। किस्सा इस प्रकार ख्2, हैःµ

‘‘एक समय राजा हरिश्चन्द्र जब शिकार खेल रहे थे उन्होंने कुछ स्त्रियों का

रूदन सुना। स्त्रियां विश्वामित्र की तपस्या से व्याकुल होकर रो रही थीं। क्षत्रिय धर्म

से वशीभूत होकर निस्सहाय की रक्षा करने हेतु तथा गणेश की वशीभूत हो राजा

चिल्लाए, ‘‘यह कौन पापी है जो मुझ जैसे प्रतापी राजा के सम्मुख आग को कपड़े

में बांध रहा है। वह आज मेरे शरों से विंध कर मृत्यु को प्राप्त होगा। यह सुनकर

विश्वामित्र को क्रोध आया और क्रोध के कारण उनका विज्ञान नष्ट हो गया। उनके

क्रोध से भयभीत होकर राजा पीपल के पत्तों की भांति कांपता हुआ उनके सामने

  1. हरिवंश पुराण में कहा गया हैः-

इस दुष्टता के कारण इंद्र ने 12 वर्ष तक वर्षा नहीं की। ऐसे में विश्वामित्र अपनी पत्नी और बच्चों को

छोड़कर समुद्र तट पर तपस्या के लिए चले गए। उनकी पत्नी दरिद्रता के कारण अपने द्वितीय पुत्र को

एक सौ गायों के बदले में बेचने को तैयार हो गई जिससे कि दूसरी संतानों को बचाया जा सके। परंतु

सत्यव्रत ने उसके पुत्र को मुक्त करा दिया और उन्हें वन्य पशुओं का मांस प्रदान किया। सत्यव्रत को

अपने पिता के आदेश पर 12 वर्ष का मौन व्रत रखना पड़ा।

जैसा कि हरिवंश पुराण में अन्यत्र लिया गया है, त्रिशंकु को उसके पिता द्वारा इसलिए देश निकाला

दिया गया कि उसने एक नागरिक की युवा पत्नी को कामावेश में उठा लिया। वशिष्ठ ने उसका पक्ष

नहीं लिया। यह इसी का प्रसंग है।

  1. म्यूर खंड 1, पृष्ठ 379-387