अध्याय 9. ब्राह्मण बनाम शूद्र - Page 142

ब्राह्मण बनाम शूद्र

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किया, तब वक ने भी अपने प्रतिद्वंद्वी पर वैसे ही आक्रमण किया। इन दोनों के डैनों

की फड़फड़ाहट से भयकर चक्रवात आए, पर्वत चूर्ण होने लगे। सारी पृथ्वी कांपने

लगी। समुद्र में जल तट के ऊपर की तरह चढ़ने लगा, पृथ्वी टूट कर पाताल की

ओर जाने लगी। इन दोनों के युद्ध से अनेक जीवों की मृत्यु हो गई। इस भयंकर

अव्यवस्था को देखकर वहां सभी देवताओं सहित ब्रह्मा उपस्थित होते हैं और दोनों

प्रतिद्वंद्वियों को युद्ध बंद करने का आदेश देते हैं। इस आदेश पर दोनों को भयंकर

क्रोध आता है, लेकिन ब्रह्मा उनको उनके मूल रूप में प्रतिष्ठित कर देता हैं और

परस्पर शांति रखने की सलाह देते हैं।’’

अन्य प्रकरण, जिसमें ये एक दूसरे के विरोधी दिखाए गए हैं अयोध्या के राजा से संबंधित है। कथा इस प्रकार हैःµ

‘‘अम्बरीष ख्1, एक यज्ञ करा रहा था तो इंद्र बलि पात्र हो उठा ले गया। पुरोहित ने कहा कि यह एक अमंगल है जो यह प्रकट करता है कि राजा का शासन कुशासन ग्रस्त है और इसके लिए बहुत बड़े प्रायश्चित की जरूरत है और वह प्राश्यश्चित है मानव की बलि। बहुत अधिक तलाश के बाद राजर्षि अम्बरीष एक ब्राह्मण ऋषि ऋचीक के पास गए जो भृगु के वंशज थे। अम्बरीष न ऋचीक से कहा कि वह बलि के लिए अपना एक पुत्र बेच दें, जिसके लिए उन्हें एक लाख गाएं दी जाएंगी। ऋचीक ने उत्तर दिया कि वह अपने ज्येष्ठ पुत्र को तो नहीं बचेंगे, उनकी पत्नी ने कहा कि वह छोटे बेटे को नहीं बेचेगी। उसने कहा कि बड़े पुत्र पर सामान्यतः पिता का दुलार होता है और छोर पर माता का। तब मझले पुत्र शनुशेप ने कहा कि इस प्रकार तो उसी को बेचा जाना है। और राजा से कहा कि वह मुझे ले चलें। एक लाख गाय, एक करोड़ स्वर्ण मुद्राएं ढेर सारे आभूषण शनुशेप के एवज में दिए गए। तब वे पुष्कर होकर जा रहे थे तो अपने मामा विश्वामित्र से मिले जो अन्य ऋषियों के साथ वहां यज्ञ कर रहे थे। शुनशेप उनकी गोदी में गिर पड़ा और अपने मामा से अपनी विवशता का वर्णन करते हुए दया की भीख मांगी।

‘‘विश्वामित्र ने उसे सांत्वना दी और अपने पुत्रों पर इस बात के लिए दबाव डाला कि उनमें से कोई एक शुनशेप के स्थान पर बलि चढ़ जाए। इस प्रस्ताव पर मधुसंयद तथा राजर्षि के दूसरे पुत्र सहमत न हुए। उन्होंने दृढ़तापूर्वक कहा कि आप यह कैसे कह सकते हैं कि आपका अपना पुत्र बलि चढ़ जाए और उसके स्थान पर किसी अन्य को बचा लिया जाए? हम इसे ठीक नहीं समझते। यह इसी प्रकार हुआ जैसे कि कोई अपना ही मांस खाए। राजर्षि को इस पर बड़ा क्रोध आया और उन्होंने अपने पुत्रों को शाप दिया कि वे अत्यंत नीच जातियों में पैदा हों, जैसे वशिष्ठ के पुत्र उत्पन्न हुए हैं, और वे हजारों वर्षों तक कुत्ते का मांस खाएं। तब उन्होंने शुनशेप से कहा कि तब तुम रस्सियों

  1. म्यूर खंड 1, पृष्ठ 405-407