128 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाड्ख्.,मय
से बंध जाओ, तुम्हारे गले में लाल डोरी पड़ी हो, जब मुझे सुगंधित लेप चढ़ाए जाएं और जब विष्णु के बलि स्तंभ के निकट ले जाए, तब तुम अग्रि से प्रार्थना करना और अम्बरीश के कान में इन दो श्लोकों को पढ़ना तुमको सफलता मिलेगी। तब शुनशेप ने अम्बरीश से यज्ञ करने के लिए कहा। जब शुनशेष को लाल वस्त्र पहनाकर बलि चढ़ाने के लिए ले जाया गया तो उसने इंद्र और विष्णु का आह्वान किया सहस्र चक्षु वालो इंद्र उस पवित्र मंत्र से प्रसन्न हुए और शुनशेप को लंबा जीवन दान दिया।’’
अंतिम किस्सा है जिसमें ये एक दूसरे के विरोधी दिखाए गए हैं राजा कल्माषपाद से संबंधित है। घटना महाभारत के आदि पर्व में हैं ख्1, ःµ
‘‘कल्माषपाद इक्ष्वाकु वंश का राजा था। विश्वामित्र उसके पुरोहित होना चाहते थे। परंतु उसने वशिष्ठ को पुरोहित बनाना बेहतर समझा। एक दिन राजा शिकार खेलने गए और शिकार खेलते हुए भूख प्यास से बहुत थक गए। मार्ग में वशिष्ठ के ज्येष्ठ पुत्र शक्ति राजा को मिले। राजा ने रास्ता छोड़ने को कहा। शक्ति ने नम्रता पूर्वक कहा- हे राजा रास्ता मेरा है। ‘‘प्राचीन नियम है कि राजा को ब्राह्मण के लिए रास्ता छोड़ देना चाहिए।’’ दोनों में इस बात पर झगड़ा हो गया। दोनों में कोई भी झुकने को तैयार नहीं हुआ। राजा ने मुनि को चाबुक से मारा। मुनि ने शाप दिया - तुम नरभक्षी राक्षक हो जाओ। उस समय कल्माषपाद के पुरोहित पद के दावे को लेकर विश्वामित्र और वशिष्ठ में शत्रुता थी। वैश्वामित्र ने राजा का पीछा किया, परंतु वशिष्ठ के पुत्र शक्ति को देखकर वह अंतर्ध्यान हो गए। राजा शाप सुनकर शक्ति से प्रार्थना करने लगे। विश्वामित्र ने अवसर पाकर एक राक्षस को आज्ञा दी कि वह राजा के अंदर प्रविष्ट हो जाए ताकि राजा और शक्ति में संधि न होने पाए। विश्वामित्र उस देश से चले गए। ब्राह्मण के शाप और विश्वामित्र के आदेश से राक्षस राजा में प्रविष्ठ हो गया। इसी समय राजा के पास एक भूखा ब्राह्मण आया। राजा ने उसके खाने के लिए नर मांस भेजा। इस पर क्रोधित होकर ब्राह्मण ने राजा को वैसा ही शाप दिया। उन पर दोनों शापों के प्रभाव से राजा शक्ति को भी खा गया। विश्वामित्र के आदेश से राजा वरिष्ठ के अन्य लड़कों को भी खा गया। जब वशिष्ठ ने यह सुना तो बड़ी धीरता से इस विपत्ति को सहन किया, वशिष्ठ ने अपने शरीर को छोड़ना निश्चय किया। वह मेरू पर्वत के शिखर से कूद पड़े। परंतु वह पत्थरों पर ऐसे गिरे जैसे कोई रूई पर गिरता है। जब इस प्रकार प्राण नहीं निकले तो जंगल की आग में घुस गए। अग्नि ने जंगल को तो जलाया लेकिन ऋषि को नहीं। फिर उन्होंने अपने शरीर पर पत्थर बांधकर स्वयं को समुद्र में फेंका, परंतु लहरों ने उन्हें किनारे की बालू पर फेंक दिया। तब वह अपनी कुटी पर वापस आ गए। परंतु उसे
खाली देखकर फिर दुख से विव्हल हो गए। वर्षा ऋतु के कारण विपासा नदी खूब चढ़ी हुई थी। उन्होंने हाथ पैर बांध कर अपने शरीर को नदी में फेंक दिया किन्तु नदी ने भी उन्हें किनारे पर धकेल दिया। फिर शतदु (सतलुज) नदी में जिसमें अनेक मगर थे अपने को फेंक दिया। ब्राह्मण के तेज को देखकर मगर सैकेड़ों दिशाओं में भाग गए। जब वशिष्ठ
- म्यूर खंड 1, पृष्ठ 415-417