शूद्र कौन थे - Page 16

प्राक्कथन

इस विषय पर उपलब्ध वर्तमान साहित्य में शूद्रों के संबंध में कोई रचना अनावश्यक नहीं मानी जा सकती। न यह कहा जा सकता है कि यह एक साधारण समस्या का विवेचन है। यह आम धारणा है कि भारतीय आर्यों का सामाजिक संगठन चातुर्वर्ण्य के सिद्धांत पर आधारित था और चातुर्वर्ण्य का अर्थ है चार वर्गों - ब्राह्मण (पुरोहित), क्षत्रिय (सैनिक), वैश्य (व्यवसायी) और शूद्र (दास) में समाज का विभाजन। इससे न तो शूद्रों की समस्या की वास्तविक स्थिति और न ही इसकी गंभीरता के किसी विचार का पता चलता है। यदि समाज का मात्र चार वर्गों में विभाजन इसका उद्देश्य होता तो चातुर्वर्ण्य बहुत साधारण का सिद्धांत होता। दुर्भाग्यवश चातुर्वर्ण्य के सिद्धांत में इससे अधिक कुछ निहित है। समाज को चार भागों में विभाजित करने के साथ-साथ, इस सिद्धांत ने आगे बढ़ कर वर्गीकृत असमानता के मत को चारों वर्णों के मध्य संयुक्त जीवन के निर्धारण का आधार बना दिया। पुनः वर्गीकृत असमानता की प्रणाली मात्र वैचारिक नहीं है। यह वैज्ञानिक और दंडात्मक। चातुर्वर्ण्य व्यवस्था में शूद्र को वर्गीकरण मेंं न केवल निम्नतम स्थान पर रखा गया है वरन् अनगिनत घृणित कर्मों और अक्षमताओं के अधीन कर दिया गया है ताकि वह निर्धारित नियमों के ऊपर सिर न उठा सके। वास्तव में जब तक अस्पृश्यों में पंचम वर्ग अस्तित्व में नहीं आया था, हिंदुओं की दृष्टि में शूद्र निम्नों में निम्नतर थे। इससे उस स्थिति का आभास होता है जिसे शूद्रों की समस्या कहा जा सकता है। यदि लोगों को इस समस्या की गंभीरता का ज्ञान नहीं है तो इसका कारण है कि वे शूद्रों की जनसंख्या के बारे में अनभिज्ञ हैं। दुर्भाग्यवश जनगणना में इनकी जनसंख्या अलग से नहीं दिखाई गई। लेकिन इसमें कोई संदेह नहीं कि अस्पृश्यों को छोड़कर हिंदुओं की 75 से 80 प्रतिशत तक जनसंख्या शूद्र है। इतनी विशाल जनसंख्या के विषय में इस शोधरचना को एक सतही समस्या का विवेचन कहना समीचीन नहीं होगा।

इस पुस्तक में भारतीय आर्य समुदाय में शूद्रों की स्थिति दर्शाई गई है। एक यह भी विचार है कि आज के युग में यह स्थिति विद्यमान नहीं है। यहां तक कि श्री शेरिंग जैसे विद्वान ने अपने ग्रंथ ‘‘हिंदू टाइम्स एंड कास्ट्स’’ में लिखा हैःµ

‘‘शूद्र आर्य हैं’’, या भारत की मूल जातियां हैं, अथवा दूसरी जातियों का मिश्रण हैं यह प्रश्न आजकल खास व्यावहारिक नहीं है। प्राचीन काल में इनका स्वयं वर्ग था और समाज में उनका चौथा दर्जा या और उन्हें अंतिम श्रेणी में रखा गया था, फिर भी