शूद्र कौन थे - Page 17

2 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाड्ख्.,मय

वे तीन श्रेष्ठ जातियों से काफी दूर थे। यदि यह मान भी लिया जाए कि आरंभ में वे आर्य नहीं थे तो भी तीन आर्य जातियों के साथ व्यापक स्तर पर अंतर्जातीय विवाहों के चलते वे आर्य समुदाय में घुल मिल गए थे। कुछ मामलों में जैसा कि ऊपर वर्णित है उन्हेंं हानि के बजाए लाभ अधिक हुआ और अब शूद्र कही जाने वाली बहुत सी जन जातियां वास्तव में और कुछ न होकर ब्राह्मण और क्षत्रियों के अधिक निकट हैं। संक्षेप में वे अन्य प्रजातियों में काफी घुल मिल गई जैसे कि इंग्लैंड के कैल्टिक कबीले आंग्ल सेक्शन जाति में विलीन हो गए और उनकी जो भी अलग पहचान थी उसका पूर्णतया अस्तित्व मिट गया।’’

इस धारणा में दो त्रुटियां हैं। पहली तो यह कि आज का शूद्र उन विजातीय वर्गों का समूह है जो भारतीय आर्य समुदाय के मूल शूद्रों से वास्तव में प्रजातीय आधार पर भिन्न है। शूद्रों के विषय में दूसरा तथ्य यह है कि हमारा चिंतन केवल व्यक्ति के रूप में शूद्रों तक नहीं है बल्कि उनकी वैधानिक व्यथा और प्रताड़नाओं की प्रथा तक जाता है जिसके वे शिकार थे। निसंदेह भारतीय आर्य समुदाय के शूद्रों के प्रति मूलतः ब्राह्मणों ने आरंभ में ही ऐसे व्यथा और प्रताड़नाओं के विधान रच दिए कि शूद्र पृथक, भिन्न और अभिज्ञेय समुदाय के रूप में अतिस्त्व खो बैठे। परंतु आश्चर्य है कि उनके लिए निर्धारित विधि विधान आज भी प्रचलित है और आज भी उन निम्न जातियों पर लागू है, जिनका मूल शूद्रों से कोई संबंध प्रतीत नहीं होता। यह सब कैसे हुआ इसकी जिज्ञासा सभी को है। मेरी व्याख्या यह है कि भारतीय आर्य समुदाय के शूद्रों को कालांतर में ब्राह्मणवादी व्यवस्थाओं की कठोरताओं ने इतना हेय बना डाला कि समाज में उनका स्थान वास्तव में निम्नतर हो गया। इसके दो परिणाम हुए एक परिणति यह हुई कि शूद्र शब्द के गुणार्थ ही बदल गए। एक वर्ग विशेष के रूप में शूद्र शब्द के मूल अर्थ में परिवर्तन हो गया और यह निम्न जातियों का सामान्य नाम बनकर रह गया जिसकी कोई सभ्यता नहीं, संस्कृति नहीं, कोई मान-सम्मान और हैसियत नहीं। दूसरा परिणाम यह हुआ कि शूद्र शब्द की परिधि बढ़ जाने से विधि विधानों का दायरा भी बढ़ गया। यही कारण है कि आज के तथाकथित शूद्र इस व्यवस्था के शिकार हो गए, यद्यपि वे शूद्र शब्द की मूल परिभाषा में नहीं आते। कुछ भी हो वास्तविकता यह है कि जो विधि-विधान मूल अपराधियों के लिए बने थे उन्हें बेकसूर लोगों पर भी थोप दिया गया। यदि हिंदू विधि वेत्ताओं को पर्याप्त ऐतिहासिक ज्ञान होता और वे मूल शूद्र शब्द को समझते, जो आज के शूद्रों से नितांत भिन्न है तो यह त्रासदी-मासूमों का यह नरसंहार टल जाता। यह तथ्य बहुत दुर्भाग्यपूर्ण है कि विधि संग्रह ही वही कठोरता आधुनिक शूद्रों के प्रति बरती जाती है जो कभी मूल शूद्रों के साथ बरती जाती थी। आत के शूद्रों के लिए यह मात्र पुरातन की जिज्ञासा ही नहीं है कि यह विधि विधान कैसे अस्तित्व में आए।

  1. खंड 1 भूमिका पृ. xxi