178 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाड्ख्.,मय
- यदि शूद्रों को वेदाध्ययन, उपनयन और यज्ञ का अधिकार नहीं था तो उसे ये अधिकार
क्यों नहीं दिए गए?
- उपनयन कराने, वेद पढ़ाने और यज्ञ कराने का अधिकार केवल ब्राह्मण को था। शूद्रों
का उपनयन, वेदाध्ययन और यज्ञ कराना निश्चित रूप से ब्राह्मणों के लिए आय के
साधन थे। यदि वे सदाशयता से काम लेते और शूद्रों को यह अधिकार और अवसर
देते तो उन्हें समुचित दक्षिणा मिलती। ऐसा करने से उन्हें कोई हानि न होती। साथ
ही उनकी आय में वृद्धि भी हो जाती। ऐसा होने पर भी ब्राह्मणों ने शूद्रों को क्षमा
न करने का संकल्प क्यों लिया?
- फिर यदि शूद्रों को उपनयन, वेदाध्ययन और यज्ञ का अधिकार नहीं था, तब ब्राह्मण
अपने विशेषाधिकारों के बलबूते पर उन्हें यह अधिकार देना अंगीकार कर सकते थे।
अतः यह विकल्प ब्राह्मणों की व्यक्तिगत इच्छा पर क्यों नहीं छोड़ा गया इन निषिद्ध
(ब्राह्मणों द्वारा घोषित) कार्यों को कराने वाले ब्राह्मण के लिए दंड की व्यवस्था क्यों
की गई?
इन पहेलियों/विसंगतियों का वास्तविक उत्तर क्या है? न तो पुरातन पंथी हिंदुओं ने ही इनका उत्तर देने का प्रयास किया है और न आधुनिक शोधकर्ताओ, विद्वानों का ध्यान इस ओर गया है। वास्तविकता तो यह है कि उन्हें इन गोरख धंधों के अस्तित्व का आभास तक नहीं था। पुरातन पंथी हिंदू तो पुरूष सूक्त के इस ‘‘ब्रह्म वाक्य’’ से ही संतुष्ट हैं कि शूद्र की उत्पत्ति पुरुष (ईश्वर) के पैरों से हुई है। अतः वह इस ओर सोचाता तक नहीं। दूसरी ओर आधुनिक अनुसंधानकर्ताओं ने यह मानकर संतोष कर लिया कि शूद्र अनार्य थे, जिनके लिए पृथक विधि विधान की रचना की गई। यह
खेद का विषय है कि इन शोधकर्ताओं के किसी भी वर्ग ने न तो शूद्रों की समस्या से संबंधित इन पहेलियों को हल करने के लिए आवश्यक शोध कार्य किया है और न ही कोई ऐसा सिद्धांत प्रतिपादित किया है, जिससे शूद्रों की उत्पत्ति और उनके पतन के प्रश्न का समाधान हो सके।
मेरा सिद्धांतमत इन सब सवालों का जवाब है। उपरोक्त तथ्यों में से तथ्य संख्या 1 से 4 में बताया गया है कि शूद्र राजा और मंत्री हो सकते थे। यही कारण है कि ऋषियों ने उनका यशोगान किया और उनका कृपा भाजन बनना पसंद किया। तथ्य संख्या 5 और 6 में स्पष्ट किया गया है कि विधान रच कर शूद्रों को उपनयन के अधिकार ने वंचित कर दिया गया। इस प्रकार कोई संदेह बाकी नहीं रह जाता जिसका समाधान मेरे इस शोध प्रबंध में न मिलता हो। अतः मुझे यह कहने का पूरा अधिकार है कि शूद्रों की उत्पत्ति और पतन के संबंध में मेरा मत शुद्ध और त्रुटिहीन तथा युक्तिसंगत है। मेरा कथन है कि इस विषय पर कोई और रचना इससे बेहतर नहीं हो सकती।