26 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाड्ख्.,मय
यह तर्कसंगत है कि ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र चातुर्वर्ण्य के अंतर्गत आते हैं। अछूत तथा अतिशूद्र चातुर्वर्ण्य के बाहर है। इसी प्रकार द्विज और अद्विज शब्द परस्पर विरोधी अर्थ रखते हैं। द्विज का अर्थ है दो बार जन्म लेने वाला और अद्विज का अर्थ है केवल एक बार जन्म लेने वाला। यह अंतर उपनयन के अधिकार पर आधारित है। उपनयन संस्कार को दूसरा जन्म माना गया है। जनेऊ या यज्ञोपवीत धारण करने वाले द्विज कहलाते हैं। जिन्हें यह अधिकार नहीं है वे अद्विज कहलाते हैं। इसलिए ब्राह्मण, क्षत्रिय या वैश्य को यह अधिकार है इसलिए ये द्विज हैं। शूद्र और अतिशूद्र जनेऊ के अधिकार से वंचित हैं। अतः ये अद्विज हैं। इसी प्रकार त्रैवर्णिक शब्द भी शूद्र का विपर्याय है। किन्तु इस विपर्याय में कुछ विशेष भेदभाव नहीं है। इस में इतना ही भेदभाव है जितना द्विज और अद्विज में है, इसके सिवाय यह अंतर शूद्रों तक ही सीमित है और अति शूद्र वर्ण व्यवस्था से बाहर है। शायद यह अभिव्यक्ति अतिशूद्रों के एक अलग वर्ण के रूप में अस्तित्व में आने से पूर्व ही अस्तित्व में आई।
इस तथ्य को ध्यान में रखते हुए कि शूद्र और अति शूद्र दोनों ही अद्विज हैं, तो शूद्र सवर्ण क्यों हैं और अतिशूद्र अवर्ण क्यों हैं? शूद्र चातुर्वर्ण्य व्यवस्था के अंतर्गत और अतिशूद्र उससे बाहर क्यों हैं? ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र सवर्ण होने के नाते चातुर्वर्ण्य व्यवस्था के चार स्तंभ माने जाते हैं। ये सभी सवर्ण हैं तब फिर त्रैवर्णिकों को प्राप्त अधिकारों से शूद्र वंचित क्यों हैं।
क्या शूद्रों की इस पहेली से भी बड़ी कोई और पहेली हो सकती है? निश्चय ही इसकी जांच करने और इसकी समीक्षा करने की आवश्यकता है कि शूद्र कौन थे और वे आर्यों के समाज में चौथा वर्ण कैसे बने?