शूद्रों की गूढ़ समस्या
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यज्ञ के लिए पुरोहितों की कुल 17 श्रेणियां थीं। यदि कोई रचनाकार किसी पुरोहित की उत्पत्ति विधाता के एक अलग अंग से बताने का प्रयास करता है तो उसके लिए यह संभव न होता था कि वह किसी पुरोहित की उत्पत्ति पुरुष के पैरों से जोड़ता क्योंकि पुरोहित के वर्गों की संख्या पुरुष के अंगों से अधिक हैं फिर वैशाम्पायन ने क्या किया? उसे विधाता के एक ही अंग से पुरोहितों के अनेक वर्णों की उत्पत्ति दर्शाने में कोई आपत्ति नहीं हुई। वह किसी भी पुरोहित की उत्पत्ति पुरुष के पैर से दिखाने के प्रश्न को बड़ी चालाकी से बचा गया है।
उत्पत्ति के विषय में पुरुष सूक्त में शूद्रों के साथ दिखाई गई, तिरस्कार की भावना की हरिवंश पुराण में ब्राह्मणों को दिए गए सम्मान से तुलना करने पर पता चलता है कि ‘‘पुरुष सूक्त’’ में शूद्रों के साथ कितना षडयंत्र रचा गया है। क्या शूद्रों की उत्पत्ति पैरों से बता कर ‘‘पुरुष सूक्त’’ को शूद्रों के विरुद्ध विषवमन करना किसी सुनियोजित योजना के अधीन सौंपा गया? क्या उसने अपना कर्तव्य पालन नहीं किया? अतः अब देखना यह है कि इस द्वेष का कारण क्या था?
IV
समाज शास्त्रीय दृष्टि से पुरुष सूक्त की विवेचना करने पर शूद्रों के संबंध में उपरोक्त पहेलियों का महत्व समझ में आता है। शूद्रों की स्थिति के संबंध में कुछ और विचित्र कल्पनाएं है। जो चातुर्वर्ण्य के आदर्श के परिणाम स्वरूप उत्पन्न हुई। इन परिणामों के लिए सर्वप्रथम चातुर्वर्ण्य के बाद में हुए परिवर्तन का ज्ञान प्राप्त करना आवश्यक है। चातुर्वर्ण्य के बाद के परिवर्तन मुख्यतः दो हैं। पहला शूद्रों के नीचे एक और वर्ण बनाना और दूसरा यह कि शूद्र अन्य तीनों वर्णें से अलग हो गए। इन परिवर्तनों का ‘‘पुरुष सूक्त’’ की मूल योजना से ऐसा एकीकरण हुआ कि उसने कुछ विशेष शब्दों और अभिव्यक्तियों को जन्म दे डाला। ये अभिव्यक्तियां हैं - स्वर्ण, अवर्ण, द्विज, अद्विज और त्रैवर्णिक। ये शब्द मूल चातुर्वर्ण्य के उप-विभाजन और उनकी विभिन्नता को दर्शाते हैं, इन वर्णों के सापेक्षित संबंधों के विषय में जानना आवश्यक है, क्योंकि इससे एक नया रहस्य पैदा होता है। यदि विद्वान इस रहस्य को नहीं समझ पाए तो संभवतः इसके दो कारण हैं - पहला यह कि विद्वानों ने इस ओर ध्यान नहीं दिया कि वर्णों के ये नाम केवल नाम ही नहीं हैं अपितु ये वास्तविक अधिकारों और विशेषाधिकारों को दर्शाते हैं। दूसरे, विद्वानों ने यह जानने का प्रयास ही नहीं किया कि नाम की आड़ में और विशेषाधिकारों के लिए किया गया यह वर्गीकरण न्यायोचित और तर्कपूर्ण भी है या नहीं।
अब हमें यह जानना है कि इन शब्दों के विधि सम्मत अर्थ क्या है? सवर्ण शब्द आमतौर पर अवर्ण का विलोम है। सवर्ण का अर्थ है वह जो चारों वर्णों में से कोई एक है। अवर्ण वह है जिसका चारों वर्णों से कोई संबंध नहीं है। ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र सवर्ण हैं। अछूत अथवा अति शूद्र अवर्ण कहलाते हैं अर्थात जिनका कोई वर्ण नहीं है।