अध्याय 5. आर्यों के विरुद्ध कार्य - Page 88

अध्याय 5
आर्यों के विरुद्ध आर्य

इस बात पर काफी विचार कर चुके हैं कि किस प्रकार पाश्चात्य विद्वानों द्वारा आर्य जाति के संबंध में प्रतिपादित सिद्धांत कितने बेबुनियादी हैं और ब्राह्मणों ने उनको सहर्ष स्वीकार कर लिया। फिर भी इस सिद्धांत का लोगों पर इतना गहरा प्रभाव है कि इसके विरोध में कुछ भी कहना उन्हें पसंद नहीं होगा। उन्हें समूल नष्ट कर देना चाहिए। इस स्थिति में पाश्चात्य सिद्धांत के खोखलेपन का विश्लेषण आवश्यक है।

आर्यों के बाहर से आने और दास दस्यु जातियों को पराजित करने के सिद्धांत का समर्थन करने वाले ऋग्वेद के निम्नांकित मंत्रों को अनदेखा करते हैं। इन मंत्रों का निर्णायक महत्व है। आर्यों के भारत से बाहर से आने और स्थानीय निवासियों को पराजित करने के सिद्धांत को इन मंत्रों के संदर्भ के बिना स्वीकार करना अनुचित होगा। मैं इन मंत्रों को प्रस्तुत करता हूं।

  1. ऋग्वेद (5-33.3) - ‘‘हे इंद्र तूने हमारे दोनों विरोधियों दासों और आर्यों को मार

डाला’’

  1. ऋग्वेद (6-60.3)- ‘‘धर्म और न्याय के रक्षक इंद्र और अग्नि हमें दुख पहुंचाने

वाले दासों और दस्युओं का दमन करें’’।

  1. ऋग्वेद (7-81.1)- ‘‘इंद्र और वरूण ने सुदास के शत्रु दास और आर्यों का हनन

किया और सुदास की रक्षा की’’।

  1. ऋग्वेद (8-24.27) - ‘‘हे इंद्र, तुमने राक्षसों और सिंधु के तटवर्ती क्षेत्रों में

निवास करने वाले आर्यों से हमारी रक्षा की है, अब तुम दासों को भी शस्त्रहीन

बनाओ।’’

  1. ऋग्वेद (10-38.3) - ‘‘हे परम उपासनीय इंद्र, दास और आर्य विधर्मी हैं और

हमारे शत्रु हैं। उनका दमन करने के लिए हमें अपना आशीर्वाद दो। तुम्हारी सहायता

से हम उन्हें मार डालेंगे।’’

  1. ऋग्वेद (10-86.19) - ‘‘हे मामेयु, अपने आराधकों को शक्ति दो। तुम्हारी सहायता

से हम अपने शत्रु आर्यों और दासों का विनाश करेंगे।’’