74 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाड्ख्.,मय
इन मंत्रों को पढ़ कर ठंडे दिमाग से सोचने पर पाश्चात्य सिद्धांत की वास्तविकता प्रकट की जाएगी। यदि इन मंत्रों के सृष्टा आर्य थे तो इन मंत्रों के साक्ष्य पाश्चात्य मत को आधारहीन बनाते है। साथ ही यह स्पष्ट होता है कि आर्यों की दो जन श्रेणियां थीं जो अलग-अलग थी तथा एक दूसरे से विद्धेष रखती थीं। दो आर्य जातियों के अस्तित्व की बात कपोल कल्पित नहीं है। यथार्थ है। इसके पक्ष में अनेक साक्ष्य भी उपलब्ध हैं।
II
पहला साक्ष्य तो विभिन्न वेदों के पवित्र स्वरूप की मान्यता के बारे में भेदभाव का होना है। वेदों के विद्वान जानते हैं कि वेद केवल दो हैंः - ऋग्वेद और अथर्ववेद। सामवेद और यजुर्वेद तो ऋग्वेद के विभिन्न स्वरूप मात्र हैं। यह सर्वविदित है कि दीर्घकाल तक ब्राह्मण अथर्ववेद को ऋग्वेद के समान पवित्र नहीं मानते थे। ऐसा भेदभाव क्यों था? ऋग्देव को पवित्र और अयर्थवेद को अपवित्र क्यों माना गया? मैं इसका यह उत्तर देना चाहता हूं कि दोनों वेद आर्यों की दो भिन्न-भिन्न जातियों द्वारा रचे गए थे। कालांतर में जब दोनों जातियां मिल कर एक हो गई तो अथर्ववेद को ऋग्वेद के समाना पवित्र मान लिया गया।
इसके अतिरिक्त समस्त ब्राह्मण साहित्य में विविध विचार धाराओं में दो भिन्न आर्य जातियों के अस्तित्व के संदर्भ में पर्याप्त साक्ष्य उपलब्ध हैं। सृष्टि सृजन की भिन्नता दो भिन्न वर्गों या जातियों की ओर संकेत करती है। इनमें से एक का वर्णन अध्याय-दो में किया जा चुका है। केवल दूसरी विचारधारा का वर्णन बचा है। इसके लिए हम वेदों से प्रारंभ करते हैंः-
तैतिरीय संहिता के श्लोक 6-5.6.1 ख्1, में निम्नलिखित वर्णन हैंःµ
‘‘पुत्रों की कामना से अदिति ने देवों और साध्यों के लिए ब्राह्मोदन आहुति तैयार की। उन्होंने उसका कव्य उसको (अदिति को) दिया, जिसे उसने खाया। उसे गर्भाधान हुआ और चार आदित्य ने जन्म लिया। उसने दूसरी ब्राह्मोदन आहुति तैयार की और सोचा कि जूठन से मरे चार पुत्र पैदा हुए हैं और यदि मैं इसे पहले ही खा लूं तो अत्यंत प्रतिभावान पुत्र पैदा होंगे। ऐसा सोच कर उसने आहुति का पहले ही भक्षण कर लिया। उसे गर्भाधान हुआ और उसने एक अपूर्ण अंडे को जन्म दिया। उससे उसने आदित्यों के लिए तीसरा नैवेद्य तैयार किया। जिससे आदित्य वैवस्वत का प्रदुर्भाव हुआ। यही संतति है अर्थात मानव जो यज्ञ करता है संपन्न होता है और देवों का प्रिय पात्र बनता है।’’
अब ब्राह्मण ग्रंथों की सृजन कथाओं को देखेंः-
शतपथ ब्राह्मण ख्2, 8.1.1 - ‘‘क्योंकि लोग प्रातः ही अपने हाथ धोते हैं इसलिए
म्यूर खंड 1, पृष्ठ 26
म्यूर खंड 1, पृष्ठ 181-184