गोमांस भक्षणµछुआछूत का मूलाधार
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विरुद्ध तो था नहीं। केवल छितरे व्यक्त ही अछूत क्यों बने, इसका मुख्य कारण यही था कि वे बौद्ध तो थे ही, उसके साथ उन्होंने अपनी गो-मांस खाने की नई आदत भी बना ली थी। इससे ब्राह्मणों को अपनी नयी गो-भक्ति को उसकी चरम सीमा तक पहुंचाने का और अवसर मिल गया। तब हमारा निष्कर्ष है कि छितरे व्यक्ति होने के कारण वे घृणा के पात्र बने क्यों वे बौद्ध थे और गो-मांसाहारी होने के कारण अस्पृश्यता का शिकार।
गोमांसाहार को छुआछूत का कारण होने के सिद्धांतों के स्वीकार करने से अनेक प्रश्न पैदा होते हैं। समालोचक निश्चय ही पूछेंगे, हिन्दुओं का गो-मांसाहार के विरुद्ध घृणा का कारण क्या है? क्या हिन्दू सदा से ही गो-मांसाहार के विरुद्ध रहे हैं? जिस समय हिन्दुओं ने गो-मांस भक्षण छोड़ा तो उन्होंने भी उसी समय क्यों नहीं छोड़ दिया? क्या अछूत सदैव रहे हैं? यदि ऐसा समय था जब अछूत गो-मांसाहारी होने के बावजूद अछूत नहीं थे, तो बाद में गो-मांसाहार छुआछूत का कारण कैसे बन गया?
यदि हिन्दू गो-मांस खाते रहे हैं तो उन्होंने उसे कब खाना छोड़ा? यदि अस्पृश्यता हिन्दुओं के गो-मांसाहारी होने के विरुद्ध घृणा की स्रोत है, तो हिन्दुओं को गो-मांसाहार छोड़ने के कितने समय बाद छुआछूत अस्तित्व में आयी? इन प्रश्नों का उत्तर देना ही होगा। बिना उत्तर दिये यह नया सिद्धांत संदेहास्पद रहेगा। इसे लोग संभव मान सकते हैं। किन्तु इसे निरापद स्वीकार नहीं करेंगे। जब मैंने एक सिद्धांत का प्रतिपादन किया है तो मुझे इन प्रश्नों का उत्तर भी देना ही होगा।
मैं निम्नलिखित शीर्षकों में उत्तर देना चाहता हूंःµ
(1) क्या हिन्दू गोमांस नहीं खाते थे?
(2) हिन्दुओं ने गोमांस खाना क्यों छोड़ा?
(3) ब्राह्मण शाकाहारी क्यों बने?
(4) गोमांसाहार से छुआछूत की उत्पत्ति क्यों हुई? और
(5) छुआछूत की उत्पत्ति कब से हुई?