10. गोमांस भक्षण-छुआछूत का मूलाधर - Page 103

88 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाड्ख्.,मय

करती है। गैर-अछूत, चाहे वे मांसाहारी हैं या दूसरे हैं, सभी गोमांसाहार के विरोध में एकजुट हैं। अतः अछूत, जो बिना किसी संताप और पश्चाताप के तथा आदतन ख्1, गोमांस खाते हैं, हिन्दुओं के विरुद्ध हो गए हैं।

इस संदर्भ में यह सुझाव देना कोई बड़ी बात नहीं है कि जिन्हें गोमांस भक्षण के प्रति घृणा है वे गोमांसाहारियों को अछूत मानें।

वास्तव में गोमांसाहार अछूतपन का प्रधान कारण होने के संबंध में किसी प्रकार की अटकलबाजी की आवश्यकता नहीं। इस नये सिद्धांत का हिंदू शास्त्र ही समर्थन करते हैं। वेद व्यास स्मृति में निम्नलिखित श्लोक हैं जो अन्त्यजो की श्रेणी में गिनी जातियों के नाम ख्2, और उनकी स्थिति का आधार बताते हैं।

एल-12-13 फ्चर्मकार (मोची), भट्ट (सैनिक), भील, रजक (धोबी), पुष्कर, नट (अभिनेता), व्रात्य, मेड, चाण्डाल, दास, स्वापक, कौलिक तथा वे दूसरे सब जो गोमांस खाते हैं, अंत्यज कहलाते हैं।य्

सामान्यतः स्मृतिकार अपने मन्तव्यों के क्यों और कैसे के चक्कर में कभी नहीं पड़ते। लेकिन यह एक अपवाद है क्योंकि वहां वेदव्यास अस्पृश्यता के कारणों की व्याख्या कर रहे हैं। इसमें तथा वे दूसरे सब जो गोमांस खाते हैं वाक्यांश बहुत महत्त्वपूर्ण है। इसका मतलब है कि स्मृतिकार इस बात को जानते थे कि छुआछूत का कारण गो-मांसाहार में दिया है। वेदव्यास की इस उक्ति के बाद किसी प्रकार के तर्क-वितर्क का स्थान नहीं रहना चाहिए। यह तो ‘हाथ कंगन को आरसी क्या’ बात जैसी है और विशेषता यह है कि यह व्याख्या बुद्धिगम्य भी है, क्योंकि जो कुछ हम जानते हैं उन बातों से इसका पूरा-पूरा मेल बैठता है।

अस्पृश्यता की उत्पत्ति की खोज में दो नई बातें सामने आई हैं। एक बात तो यह सामान्य घृणा है जो ब्राह्मणों ने बौद्धों के विरुद्ध फैला रखी थी और दूसरे छितरे व्यक्तियों के मांस खाते रहने की आदत है। जैसा कि पहले कहा गया है, केवल पहली बात छितरे आदमियों पर अछूतपन का कलंक लगाने के लिए पर्याप्त नहीं समझी जा सकती। क्योंकि ब्राह्मणों ने बौद्धों के प्रति जो घृणा का भाव फैलाया था वह तो सामान्य रूप से सभी बौद्धों के विरुद्ध था, कुछ केवल छितरे व्यक्तियों के

  1. अछूतों पर हिन्दुओं द्वारा गोमांस खाने का जो दोषारोपण किया जाता है उससे प्रभावित होकर अछूतों ने गोमांस खाना छोड़ने के बजाय एक नये दर्शन का आविष्कार किया है। उनका कहना है कि हम गा­ ेमांस को यों ही इधर-उधर न फेंककर उसे खा लेते हैं। यह हमारा गो भक्ति का श्रेष्ठतर ढंग है।
  2. काशी की हिस्ट्री ऑफ धर्म सूत्र खण्ड II. भाग 1, पृ. 71 से उद्द्धत।