गैर-ब्राह्मणों ने गोमांस खाना क्यों छोड़ा?
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खास सरोकार नहीं था और न इसे वह अपना कोई खास कर्तव्य ही समझता था कि गो को हत्या से बचाए। अशोक प्राणी मात्र पर, चाहे वह मनुष्य हो चाहे पशु हो, दया चाहता था।
वह मानता था कि जहां-जहां अनावश्यक रूप से पशु हत्या होती है उसे बंद कर दिया जाए। यही कारण है कि उसने यज्ञों के लिए पशु बलि ख्1, का निषेध किया, जो उसने आवश्यक समझा। उसने उन पशुओं के वध को निषिद्ध ठहराया जो किसी उपयोग में नहीं आते अथवा जो खाए नहीं जाते। ऐसा पशुओं का निरर्थक वध वास्तव में अनुचित है। अशोक ने विशेष रूप से गो वध के विरुद्ध कोई कानून नहीं बनाया। यदि हम बौद्ध दृष्टिकोण समझ लें तो इस बात को लेकर अशोक पर दोषारोपण नहीं किया जा सकता।
अब हम मनु को लेते हैं। उसने भी गो हत्या के विरुद्ध कोई कानून नहीं बनाया। उन्होंने तो विशेष अवसरों पर भी मांसाहार अनिवार्य ठहराया है।
तब फिर अब्राह्मण ने गो मांसाहार क्यों छोड़ दिया? उनके इस त्याग का कोई सुस्पष्ट और सहज कारण नहीं मालूम पड़ता है। लेकिन इसका कोई न कोई कारण तो होना ही चाहिए। जो कारण मुझे सूझता है वह यह है कि अब्राह्मण ने ब्राह्मण की नकल करने के प्रयत्न में गो मांस खाना छोड़ा यह एक नया विचार हो सकता है किंतु यह कोई असंभव बात नहीं। श्री गैब्रायल टार्दे नाम के फ्रांसीसी लेखक ने संस्कृति के बारे में लिखा है कि वह किसी निम्न स्तर के वर्ग विशेष में अपने से ऊंचे स्तर के वर्ग की संस्कृति का अनुसरण करने से फैलती है। यह नकल करना इतने धीरे-धीरे होता है और यह मशीन की तरह अपना काम इस तरह करता है जैसे कोई भी प्राकृतिक नियम। गैब्रायल टार्दे ने नकल करने के नियमों की चर्चा की। उसमें से एक यह है कि नीचे के वर्ग के लोग सदैव ऊपर के वर्ग के लोगों की नकल करते हैं। यह एक ऐसी सामान्य जानकारी की बात है कि शायद ही कोई आदमी इसके यथार्थ को अस्वीकार करे।
अब्राह्मणों में जो गो-पूजा का भाव उदय हुआ और उन्होंने जो गोमांस खाना छोड़ा, इसमें तनिक संदेह नहीं कि वह अपने से ऊंचे दर्जे के ब्राह्मणों की नकल करने की प्रकृति का ही परिणाम है। यह भी सत्य है कि ब्राह्मणों द्वारा गो-पूजा के पक्ष में बहुत प्रचार कार्य किया गया है। गायत्री पुराण एक उदाहरण है। लेकिन मूलतः यह नकल करने की स्वाभाविक प्रवृत्ति का ही परिणाम है। हां अब इससे एक दूसरा प्रश्न उठता हैµब्राह्मणों ने गोमांस खाना क्यों छोड़ा?
- देखें शक, एडिट-1