13. ब्राह्मण शाकाहारी क्यों बने? - Page 122

अध्याय 13

ब्राह्मण शाकाहारी क्यों बने?

यह स्पष्ट है कि अब्राह्मणों में एक क्रांति हुई। गो मांसाहार छोड़ देना एक क्रांति ही थी। लेकिन अब्राह्मणों में एक क्रांति हुई तो ब्राह्मणों में दोहरी क्रांति हुई। उन्होंने गोमांस खाना छोड़ा, यह एक क्रांति हुई। मांसाहार स्पर्श त्याग दूसरी क्रांति है।

इसमें तनिक संदेह नहीं है कि यह एक क्रांति थी क्योंकि जैसा पूर्व के अध्यायों में वर्णित किया गया है, एक समय था जब ब्राह्मण सबसे अधिक गो मांसाहारी थे। यद्यपि अब्राह्मण लोग भी मांस खा लेते थे किंतु उनको वह प्रतिदिन सहज सुलभ नहीं था। गो एक अमूल्य पशु था और अब्राह्मण लोग केवल भोजन के लिए गोहत्या करें यह उनके लिए बहुत कठिन था। वह खास-खास समयों पर ही ऐसा कर सकता था। उस समय जब या तो उसे उसका धार्मिक कर्तव्य या किसी देवता को प्रसन्न करने की व्यक्तिगत विवशता होती थी। लेकिन ब्राह्मण की बात दूसरी थी, वह पुरोहित था। कर्मकांड के उस युग में शायद ही कोई दिन ऐसा हो जब किसी न किसी यज्ञ के निमित्त गो वध न होता हो और जिसमें कोई न कोई अब्राह्मण किसी न किसी ब्राह्मण को न बुलाता हो। ब्राह्मण के लिए हर दिन गोमांसाहार का दिन था। इसलिए ब्राह्मण सबसे बड़े गोमांसाहारी थे। ब्राह्मणों का यज्ञ धर्म के नाम पर निरीह और मासूम पशुओं की हत्या के आयोजन के अतिरिक्त और कुछ नहीं होता था। वह बड़े तामझाम के साथ होता था और अपनी गो मांस लालसा को छिपाए रखने के लिए उसे गूढ़ बनाने का प्रयत्न किया जाता था। इस रहस्यमय ठाठ बाठ की कुछ जानकारी पशु हत्या के संबंध में ऐतरेय ब्राह्मण में परिलक्षित है।

पशु की हत्या से पहले अत्यंत जटिल और विविध मंत्रों के साथ प्रारंभिक संस्कार किया जाता था। बलि की मुख्य बातों का आभास करा देना पर्याप्त है। बलि स्तंभ को ही यूप कहते हैं। उसी की स्थापना से यज्ञ आरंभ होता है। पशु की हत्या से

  1. ऐतरेय II, पृ. 72-74