130 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाड्ख्.,मय
बात निश्चयपूर्वक मान ली जा सकती है कि अतीत काल में जब एक जगह बसे कबीले और ये छितरे हुए आदमी दोनों गोमांस खाते थे तो उस समय एक जगह बसे हुए कबीले ताजा गोमांस खाते और दूसरे मृत गोमांस। साथ ही यह बात भी कि प्रथा समस्त भारत में प्रचलित थी न कि केवल महाराष्ट्र में।
यह पहली आपत्ति का समाधान हो गया। अब दूसरी आपत्ति लें। गुप्त राजाओं ने गोवध के विरुद्ध जो कानून बनाया था वह उन लोगों के लिए था जो गोवध करते थे यह छितरे हुए आदमियों पर लागू नहीं होता था क्योंकि वे गोवध नहीं करते थे। वे केवल मृत गाय का मांस खाते थे। उनका आचरण गोवध निषेध के विरुद्ध नहीं पड़ता था। इसलिए मृत गाय का मांस खाने की प्रथा जारी करने दी गई। यदि यह मान लें कि ब्राह्मणों और अब्राह्मणों के गोमांसाहार छोड़ने का संबंध अहिंसा से था तो यह आचरण अहिंसा के भी विरुद्ध नहीं था। गोवध करना हिंसा थी, किन्तु गाय का मांस खाना हिंसा नहीं थी। इसलिए इन छितरे हुए आदमियों के लिए मृत गाय का मांस खाते रहने में किसी प्रकार के मनस्ताप का भी कोई कारण नहीं था। जो कुछ वे कर रहे थे उसमें न विधान ही किसी प्रकार की बाधा डाल सकता था और न सिद्धांत ही, क्योंकि न यह नियम के विरुद्ध था और न सिद्धांत के ही।
उन्होंने ब्राह्मणों और अब्राह्मणों का अनुकरण क्यों नहीं किया? इसके दो उत्तर हैं। पहला तो यह कि यह नकल करना उनके लिए अत्यधिक महंगा सौदा था। वे ऐसा नहीं कर सकते थे। मृत गाय का मांस उनका प्रधान जीवनाधार था। इसके बिना वे भूखों मर जाते। दूसरा मृत गायों का ढोना यद्यपि आरंभ में यह एक अधिकार था, किंतु बाद में उनका यह कर्तव्य ख्1, हो गया था क्योंकि उन्हें मृत गाय को ढोना ही पड़ता था, इसलिए वे जैसा पहले खाते रहे, उसी तरह अब भी उन्होंने उसका मांस
खाते रहने में कोई आपत्ति नहीं समझी।
इसलिए उक्त आपत्तियों से हमारा सिद्धांत किसी भी तरह तर्कहीन नहीं है।
- एफ. एन. मद्रास में सुधार आंदोलन के कारण स्थिति बदल गई है। महार मरे ढोर उठाने को तैयार नहीं सवर्ण विवश करते हैं।