14. गोमांस भक्षण से छितरे बहिष्कृत व्यक्ति अछूत कैसे बने? - Page 144

गोमांस भक्षण से छितरे व्यक्ति अछूत कैसे बने?

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छितरे लोग दोनों गोमांसाहारी थे तो उस समय भी एक प्रथा चल पड़ी थी जिसके कारण एक जगह बसे हुए लोग ताजा गोमांस खाते थे किंतु यह छितरे व्यक्ति मृत गाय का मांस खाते थे। हमारे पास कोई ऐसा निश्चित प्रमाण नहीं है कि एक जगह बसे हुए लोगों ने कभी मृत गाय का मांस नहीं खाया, किंतु हमारे पास विपरीत साक्ष्य हैं, जिससे प्रकट होता है कि मरी हुई गो पर छितरे व्यक्तियों का ही एकाधिकार हो गया था। इस साक्ष्य का संबंध महाराष्ट्र के महारों से है जिसका पहले भी उल्लेख हो चुका है। जैसा पहले कहा जा चुका है कि महाराष्ट्र के महार मृत पशु पर अपना अधिकार समझते हैं। अपने इस अधिकार को वे गांव के प्रत्येक हिंदू के मुकाबले सिद्ध करते हैं। इसका अर्थ यह हुआ कि कोई हिंदू, अपने निजी मृत जानवर का मांस कभी नहीं खा सकता। उसे यह महारों को ही सौंप देना पड़ता है। यह केवल इसी बात को कहने का एक दूसरा ढंग है कि जब गोमांसाहार एक सामान्य प्रथा थी तो महार मृत गो का मांस खाते थे और हिंदू ताजा गोमांस। अब केवल एक ही प्रश्न पैदा होता है और वह यह है कि जो बात उस समय सत्य थी क्या वह वर्तमान के संदर्भ में भी सत्य है? क्या समस्त भारत में बसे हुए कबीलों और छितरे हुए आदमियों के बीच के संबंध के रूप में महाराष्ट्र एक उदाहरण माना जा सकता है। इस संबंध में महारों में जो परंपरागत जनश्रुति प्रचलित है उसका उल्लेख किया जा सकता है। उनका कहना है कि विदर्भ (बीदर) के मुस्लिम राजा ने उन्हें 52 ऐसे अधिकार दे रखे थे जो दूसरे हिंदुओं को प्राप्य नहीं थे। यदि यह स्वीकार कर लिया जाए कि वे अधिकार उन्हें विदर्भ के राजा ने दिए थे तो उस राजा ने उन अधिकारों को पहली बार तो जन्म दिया नहीं होगा। यह अतीत काल से चले आए होंगे। राजा ने उन्हें केवल पक्का कर दिया होगा। इसका अर्थ हुआ कि छितरे व्यक्तियों के वर्ग में मृत पशुओं का मांस खाने और इन एक जगह बसे हुए कबीलों के ताजा मांस खाने की प्रथा प्राचीन समय से चली आई है। इस तरह का प्रचलन अत्यंत स्वाभाविक है। जो लोग एक जगह पर बसे हुए थे वे धनी थे। खेती और पशुपालन उनकी जीविका के साधन थे। छितरे हुए आदमी निर्धनों की जाति के थे, वे एक जगह बसे हुए लोगों पर ही सर्वथा निर्भर करते थे, जिनके पास जीविका का कोई साधन न था। दोनों के भोजन का मुख्य अंग गोमांस था। एक जगह बसे हुए लोगों के लिए यह संभव था कि वे भोजन के लिए किसी जानवर का वध कर सकें, क्योंकि उनके पास पशु थे। छितरे हुए लोग ऐसा नहीं कर सकते थे, क्योंकि उनके पास एक भी पशु नहीं होता था। ऐसी परिस्थिति में क्या यह स्वाभाविक है कि जो एक जगह बसे हुए लोग हैं वे इन लोगों को अपने पहरेदारी करने के बदले, उनकी मजदूरी के रूप में अपने मृत जानवर देना स्वीकार कर लें? निश्चय ही यह अस्वाभाविक नहीं है इसलिए यह