प्रस्तावना - Page 17

2 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाड्ख्.,मय

श्रेष्ठतम और पवित्र है जिसका श्रेय हिंदू विद्वानों की विशिष्ट मानसिकता को है।

आज विद्वत्ता का पूरा ठेका सिर्फ ब्राह्मणों को मिला हुआ है। दुर्भाग्य से इन्होंने आज तक ऐसा कोई वाल्टेयर पैदा नहीं किया जिसमें कैथोलिक चर्च के सिद्धांतों के विरोध में बिगुल बजाने की ईमानदार बौद्धिकता रही हो। भविष्य में भी किसी ऐसे व्यक्ति के प्रकट होने की आशा नहीं है। यह ब्राह्मणों की विद्वत्ता पर घोर कलंक है कि वे एक वाल्टेयर पैदा नहीं कर सके। यदि इस बात को ध्यान में रखा जाए कि ब्राह्मण ही शिक्षित हैं तो किसी को इस पर कोई आश्चर्य नहीं होगा। वे मनीषी हैं ही नहीं। एक शिक्षित और मनीषी व्यक्ति में जमीन-आसमान का अंतर है। पहला वह जो वर्ग चेतना से अभिभूत है और अपने वर्ग के हित के लिए ही मरता है। दूसरा निश्छल व्यक्ति वह है जिसके मन में वर्ग भेद की चेतना नहीं होती। क्योंकि ब्राह्मण केवल शिक्षित है इसलिए उसने कोई वाल्टेयर पैदा नहीं किया।

ब्राह्मणों ने कोई वाल्टेयर क्यों पैदा नहीं किया? इस सवाल का जवाब भी एक सवाल ही है। तुर्की का सुल्तान इस्लाम जगत की धर्म की जड़ें क्यों नहीं उखाड़ पाया? कोई पोप पादरी कैथोलिकवाद की निंदा क्यों नहीं करता? इंग्लैंड की संसद ने ऐसा कानून क्यों नहीं बनाया कि किस तरह देश की तमाम नीली आंखों वाले किशोर-किशोरियों को मार दिया जाए? इसका वही कारण है कि सुल्तान या पोप या ब्रिटिश संसद ये कार्य करने में चुप रहे वैसे ही ब्राह्मण भी कोई वाल्टेयर पैदा नहीं कर सका। इस बात को समझा जा सकता है कि किसी व्यक्ति या उसके वर्ग के स्वार्थ उसके मनोभावों को जकड़ लेते हैं और वह वैसा ही बौद्धिक कार्य करता है। ब्राह्मणों के हाथ में जो सत्ता है और उनकी जो हैसियत है वह हिंदू सभ्यता की देन है जिसमें उसे सर्वोच्च स्थान अर्पित कर रखे हैं और छोटी जातियों को नाना प्रकार की पाबंदियों से जकड़ रखा है ताकि निम्न वर्ग विद्रोह कर ब्राह्मणों को चुनौती नहीं दे सकें। यह ध्रुव सत्य है कि प्रत्येक ब्राह्मण ब्राह्मणवाद का मुकुट धारण किए ही रहेगा चाहे वह रूढि़वादी हो या नहीं, वह पुरोहित हो या गृहस्थ, विद्वान हो अथवा बुद्धिहीन। ब्राह्मण वाल्टेयर कैसे बन सकता है? ब्राह्मणों में से कोई वाल्टेयर पैदा हो गया तो वह उस सभ्यता के लिए प्रत्यक्ष खतरा बन जाएगा जिसकी रचना ब्राह्मण की श्रेष्ठता बनाए रखने के लिए की गई है। सत्यता यह है कि ब्राह्मण की बौद्धिकता इसी दायरे में सीमित है और उसे यह चिंता बनी रहती है कि उसका स्वार्थ सिद्ध होता रहे। उसकी ये अंतर्निहित दुर्बलताएं हैं इसलिए उसकी प्रतिमा उस सीमा तक नहीं उभरती जिस सीमा तक उसकी ईमानदारी और दयानतदारी का तकाजा है। उसके सिर पर यही भय सवार रहता है कि उसके वर्ग और वैयक्तिक स्वार्थों को हानि न पहुंचने पाए। पर गुस्सा तो इस बात पर आता है कि ब्राह्मण साहित्य की पोल खोलने