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के प्रयासों को ब्राह्मण लेखक सहन नहीं कर पाते। वह स्वयं भी रूढि़ भंजक की भूमिका निभाने को तैयार नहीं हैं चाहे वह कितना ही अनिवार्य क्यों न हो। यानी किसी गैर-ब्राह्मण में यह क्षमता है तो ब्राह्मण उसके आड़े आ जाएंगे और या तो उनके होंठ सिल जाएंगे या फिर बड़े अजीबो-गरीब ढंग से उसको सीधे-सीधे खारिज कर देंगे या फिर उसे व्यर्थ घोषित कर देंगे। ब्राह्मण साहित्य की कलई खोलने के लिए लिखने पर मैं इन नीच हरकतों का शिकार हो चुका हूं।
ब्राह्मण विद्वानों के इस रवैये के बावजूद मुझे अपना काम पूरा करना है क्योंकि इन वर्गों की उत्पत्ति के विषय में अनुसंधान अभी हुआ ही नहीं है। इस पुस्तक में एक सबसे अभागे वर्ग अछूतों की दशा पर प्रकाश डाला गया है। अछूतों की संख्या तीनों में से सर्वाधिक है उनका अस्तित्व भी सर्वाधिक अस्वाभाविक है। फिर भी उनकी उत्पत्ति के विषय में कोई जानकारी इकट्ठा नहीं की गई। यह बात पूरी तरह समझी जा सकती है कि हिंदुओं ने यह कष्ट क्यों नहीं उठाया। पुराने रूढि़वादी हिंदू तो इसकी कल्पना भी नहीं करते कि छुआछूत बरतने में कोई दोष भी है। वे इसे सामान्य और स्वाभाविक कहते हैं और न ही इसका उन्हें कोई पछतावा है और न ही उनके पास इसका कोई स्पष्टीकरण है। नये जमाने का हिंदू गलती का अहसास करता है परंतु वह सार्वजनिक रूप से इस पर चर्चा करने से कतराता है कि कहीं विदेशियों के सामने हिंदू सभ्यता की पोल न खुल जाए कि यह ऐसी निंदनीय तथा विषैली सामाजिक व्यवस्था है अथवा जो छुआछूत जैसी नृशंसता की जननी है। परंतु आश्चर्य तो इस बात का है कि अस्पृश्यता का मुद्दा आज तक यूरोप के समाज शास्त्रियों की नजर में ही नहीं आया। क्यों यह समझना तो मुश्किल है, फिर भी यह वास्तविकता तो है ही।
यह पुस्तक एक ऐसे विषय पर है जिसकी प्रत्येक व्यक्ति ने उपेक्षा की है, मार्गदर्शक प्रयास समझी जा सकती है। मैं कहना चाहता हूं कि यह पुस्तक मुख्य प्रश्न के सभी पहलुओं पर ही प्रकाश नहीं डालती वरन् अस्पृश्यता की उत्पत्ति पर भी उन सब प्रश्नों पर भी विचार करती है जो इससे संबंधित हैं। कुछ प्रश्न तो ऐसे हैं कि उनके विषय में बहुत कम लोग जानते हैं और जिन्हें इसके बारे में कुछ पता है भी तो इसका उत्तर ढूंढ़ने में सफल न होकर हतप्रभ होकर बैठ जाते हैं। केवल कुछ का उल्लेख करके यह पुस्तक उनका समाधान प्रस्तुत करेगी। जैसे अछूत गांवों के सिरे पर क्यों रहते हैं? गाय का मांस खाने से कोई अछूत कैसे बन गया? क्या हिंदुओं ने कभी गोमांस नहीं
खाया? गैर-ब्राह्मणों ने गोमांस भक्षण क्यों त्याग दिया? ब्राह्मण शाकाहारी क्यों बने? इस पुस्तक में इनमें से प्रत्येक का उत्तर सुझाया गया है। हो सकता है इस पुस्तक में उन प्रश्नों के उत्तर पढ़ कर सबके मुंह लटक जाएं। फिर भी यह पता चलेगा कि यह पुस्तक पुरानी बातों पर नई दृष्टि से विचार करने का प्रयास अवश्य है।