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गैर-हिन्दुओं में छुआछूत

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की परिक्रमा लगाता था। उससे पहले वहां आरंभिक नगर की प्राचीनतम सीमाओं की वार्षिक परिक्रमा होती थी। अरवल नामक पादरी उसका नेतृत्व करते थे। यह प्रदक्षिणा अम्बरबलिया कहलाती थी और यह निश्चयात्मक रूप से देवताओं को संतुष्ट करने के लिए ही की जाती थी। जब रोम राज्य की सीमा में वृद्धि हुई तो ऐसा नहीं लगता था कि उसी अनुपात में शुद्धिकरण के संस्कार में भी वृद्धि की गई हो। यह परिक्रमा अन्यत्र इटली के बाहर और भीतर तथा यूनान में भी होती थी। मंत्रों वाली प्रार्थनाओं के विशुद्ध उच्चारण में कुछ जादू का सा प्रभाव रहा प्रतीत होता है। इनके उच्चारण में यदि कोई अशुद्धि रह गई तो उनका प्रायश्चित करना होता था। जैसे प्राचीन रोम की न्याय पद्धति में यदि उनके शाब्दिक उच्चारण में कोई अशुद्धि रह जाती तो वादी अपना आरोप अथवा मुकदमा ही हार जाता।

अनोखे प्राचीन रीति-रिवाजों के कुछ दूसरे रूप भी देवताओं को प्रसन्न करने की कल्पना के ही साथ जुड़े थे। साली नामक प्राचीन पादरी विशेष अवसर पर नगर के भिन्न-भिन्न स्थानों की परिक्रमा करते थे। वे अपने हथियारों तथा वाद्यों को भी पवित्र करते थे जिससे आदिम लोगों की इस कल्पना को बल मिलता है कि सेना के शस्त्रों के सफल प्रयोग के लिए उनका पवित्र होना आवश्यक है। सरकारी गणना जिसका समापन शुद्धिकरण के साथ होता था वह भी वास्तव में एक सैनिक प्रक्रिया ही थी क्योंकि वह उस केन्द्रीय समिति से संबंधित थी जो सामान्य शस्त्रधारी सेना ही हैं। यह सैनिक शुद्धिकरण सेना में कभी-कभी व्याप्त हो जाने वाले मिथ्या भय को दूर करने के लिए उसी समय होता था जब सेना युद्ध क्षेत्र में पहुंचती थी। अन्य अवसरों पर यह केवल रोगादि से बचाव के लिए होता था। नौ-सेनाओं का भी शुद्धिकरण होता था।

सभी आदिम लोगों की तरह हिबू भी अशुद्धि की कल्पना को मानते थे। उनकी प्रदूषण की कल्पना की विशेषता उनका यह विश्वास था कि शुद्धिकरण गन्दे पशुओं के अस्थि पंजर के स्पर्श से अथवा उनका मुर्दामांस खाने से पैदा होती है, अथवा रेंगने वाले पशुओं, अथवा सदैव गन्दे रहने वाले पशुओं के स्पर्श से होती है। वे सब पशु जिनके खुर चिरे होते हैं जुगाली नहीं करते हैं, जो अपने पैरों के बल चलते हैं और चौपाया पशुओं से अशुचिता पैदा होती है। किसी गंदे आदमी से स्पर्श होना भी हिबू लोगों के लिए अशुद्धि थी। हिबू लोगों की अशुद्धि की दो और विशेषताएं भी कहीं जा सकती हैं। वे मानते थे कि मूर्ति पूजा भी अशुद्धि का कारण हो सकती है, और लोगों की लैंगिक अशुद्धता से प्रदेश का प्रदेश अपवित्र हो जाता है।

संक्षेप में इस विस्तृत ब्यौरे के बाद हम यह कह सकते हैं कि आदिम समाज अथवा प्राचीन समाज के लोग अशुद्धि की कल्पना को मानते थे।