अध्याय 2
हिन्दुओं में छुआछूत
अशुद्धि के बारे में हिन्दुओं में और आदिम अथवा प्राचीन समाज के लोगों में कोई भेद नहीं है। हिन्दू अशुद्धि की कल्पना मानते थे और उसे स्वीकार करते थे जो मनुस्मृति से सुस्पष्ट है। मनु ने शारीरिक अशुद्धि और मानसिक अशुद्धि को माना है।
मनु ने जन्म ख्1,, मृत्यु तथा मासिक धर्म ख्2, को अशुद्धि का जनक स्वीकार किया है। मृत्यु से होने वाली अशुचिता व्यापक और बहुत दूर तक फैलती थी। यह रक्त संबंध का अनुसरण करती थी। मृत्यु से मृत व्यक्ति के परिवार के सभी लोग जिन्हें सपिण्डक तथा समानोदक ख्3, कहते हैं अपवित्र होते थे। इसमें न केवल मातृ पक्ष के संबंधी मामा ख्4, आदि सम्मिलित थे बल्कि दूर-दूर के संबंधी भी शामिल थे। वह दूर के संबंधियों ख्5, तक को प्रभावित करती थी जैसे (1) आचार्य (2) आचार्य ख्6, पुत्र ख्7, (3) आचार्य भार्या ख्8, (4) शिष्य ख्9, (5) सहपाठी ख्10, (6) श्रोत्रिय ख्11, (7) राजा ख्12, (8) मित्र ख्13, (9) परिवार के लोग ख्14, (10) शव को ले जाने वाले ख्15, (11) मृत देह को स्पर्श करने वाले ख्16, ।
अध्याय पांच- 58, 61, 63, 71, 77, 79
अध्याय तीन- 45, 46
अध्याय चार- 40, 41, 57, 208
अध्याय पांच- 81
अध्याय पांच- 66, 85, 108
अध्याय पांच- 65, 80, 82
अध्याय पांच- 80
वही
अध्याय पांच- 81
अध्याय पांच- 71
अध्याय पांच- 81
वही- 82
वही
अध्याय पांच- 81
अध्याय पांच- 64, 65, 85
अध्याय पांच- 64, 65