20 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाड्ख्.,मय
जो कोई भी अशुद्धि की परिधि में आता था वह उससे बच नहीं सकता था। केवल कुछ ही लोग इसके अपवाद थे। निम्नलिखित श्लोकों में मनु ने उन अपवादों का नाम लिया है। उनका हिंदी रूपांतर दिया गया है और ऐसा करने का कारण भी बताया हैःµ
पांच 93 - अभिषिक्त राजा, व्रती (ब्रह्मचारी तथा चान्द्रायणादि व्रत करने वाले), यज्ञकर्ता (यज्ञ में दीक्षित) लोगों को (सपिण्डके मरने पर) अशुद्धि (अशौच) दोष नहीं होता है, क्योंकि राजा अभिषिक्त होने से इन्द्रापद को प्राप्त होते हैं तथा व्रती और यज्ञकर्ता ब्रह्मतुल्य निर्दोष हैं।
पांच 94 - राजसिंहासनारूढ़ राजा की (राज्यभ्रष्ट राजा की नहीं) तत्काल शुद्धि होती है, इसमें प्रजा की रक्षा के लिए राजसिंहासन ही कारण है।
विमर्श - प्रजारक्षार्थ राजसिंहासन के शुद्धि में कारण होने से क्षत्रिय-भिन्न ब्राह्मण, वैश्य या शूद्र भी राजसिंहासन पर रहेगा तब उसकी भी शुद्धि तत्काल होती है। क्योंकि यहां जाति विवक्षित नहीं है, अपितु पद विवक्षित है।
पांच 95 - नृप से रहित युद्ध में मारे गये, बिजली से मरे हुए, राजा (किसी अपराध में राजदण्ड) से मारे गए अर्थात् प्राणदण्ड प्राप्त, गौ तथा ब्राह्मण की रक्षा के लिए (युद्ध के बिना भी जल, अग्नि या व्याघ्र आदि से) मारे गए और (अपनी कार्य हानि नहीं होने के लिए) राजा जिसकी तत्काल शुद्धि चाहता हो, उसकी (तत्काल शुद्धि होती है)।
पांच 96 - राजा चन्द्र, अग्नि, सूर्य, वायु, कुबेर, इन्द्र, वरुण और यम इन आठों लोकपालों के शरीर को धारण करता है।
पांच 97 - (अतएव) राजा लोकपालों के अंश से अधिष्ठित है, इस कारण इस (राजा) को अशौच नहीं होता है_ क्योंकि मनुष्यों की शुद्धि या अशुद्धि लोकपालों से होती है या नष्ट (दूर) होती है। अतएव दूसरों की शुद्धि और शुद्धि के उत्पादक और विनाशक लोकपालों के अशंभूत राजा को अशुद्धि कैसे हो सकती है।
इससे स्पष्ट है कि राजा और धर्म युद्ध में मारे गए लोगों के संबंधी तथा वे जिन्हें राजा अशुद्धि का अपवाद बनाए रखना चाहता था, सामान्य नियमों से प्रभावित नहीं थे। मनु का यह कथन कि ब्राह्मण सदैव पवित्र होता है, शाब्दिक अर्थों में ग्रहण किया जाना चाहिए अर्थात ब्राह्मण को सर्वोपरि बनाकर रखना। इसका यह अर्थ नहीं लेना चाहिए कि ब्राह्मण अपवित्रता से मुक्त था क्योंकि वह ऐसा नहीं था। जन्म और मृत्यु के अतिरिक्त ब्राह्मण पर तो अपवित्रता के और भी अनेक कारण लागू थे जो अब्राह्मणों पर लागू नहीं थे। मनुस्मृति ऐसे निषेधों से भरी पड़ी है, जो केवल ब्राह्मणों