32 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाड्ख्.,मय
अपवित्र माना गया है, परंतु केवल व्यक्तियों को। सारी की सारी जाति को कभी कहीं अपवित्र नहीं माना गया और उनकी अपवित्रता अल्पकालीन होती थी तथा किसी शुद्धि की क्रिया द्वारा इसका निदान हो जाता था। एक बार अपवित्र, सदा के लिए अपवित्र, के सिद्धांत पर आधारित इस प्रकार की स्थायी छुआछूत कहीं देखने में नहीं आती। अहिन्दू समाज में लोगो को अपवित्र माना गया और उनका सामाजिक सम्पर्क भी बंद हुआ है लेकिन ऐसा कहीं नहीं हुआ कि वे एक वर्ग को अनन्त काल तक पृथक या अस्पृश्य बना दिया जाए। अहिन्दुओं ने एक जमात की जमात को अपवित्र मानकर उनके साथ वैसा बर्ताव किया है, लेकिन वे अजनबी की भांति बाह्य रहे हैं, रक्त सीमा के संबंधों के घेरे से बाहर। ऐसा कभी हुआ ही नहीं है कि किसी ने अपनी ही प्रजाति को पीढ़ी-दर-पीढ़ी और स्थायी रूप से अपवित्र बनाकर रखा हो।
इस प्रकार हिंदुओं की अस्पृश्यता एक अजीब दस्तूर है, संसार के किसी दूसरे हिस्से में आज तक कभी इसकी मिसाल नहीं मिलती। किसी दूसरे समाज में ऐसी चीज है ही नहीं। आदिम समाज में, प्राचीन समाज में अथवा वर्तमान समाज में छुआछूत के अध्ययन से जो अनेक समस्याएं होती हैं और जिसके हल करने की आवश्यकता है, उसका समावेश इन दो बातों में हो जाता हैःµ
(1) अछूत गांव से बाहर क्यों रहते हैं?
(2) उनकी अपवित्रता अनन्त और अनिवारणीय कैसे बन गई?
अगले पृष्ठों में इन्हीं दो प्रश्नों का उत्तर देने का प्रयत्न किया गया है।