हिन्दुओं में छुआछूत
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अहिन्दू समाज ने अपवित्रता से बचे रहने के लिए पार्थक्य के जो नियम मान रखे हैं, ये तर्कसंगत नहीं भी माने जाएं तो भी समझने योग्य हैं। यह पार्थक्य जन्म, विवाह, मृत्यु आदि विशेष अवसरों पर होता है, किंतु हिंदू समाज का यह पार्थक्य अथवा यह अस्पृश्यता स्पष्टः निराधार ही है।
आदिम समाज जिस अपवित्रता को मानता था वह थोड़े समय रहती थी और
खाने-पीने आदि शारीरिक कार्यों तक सीमित थी। जीवन में जन्म, मृत्यु, मासिक धर्म आदि जो असाधारण अवसर होते हैं उन्हीं पर पैदा होती थी। अशुद्धता का समय बीत जाने पर शुद्धि संस्कार हो चुकने पर व्यक्ति की अपवित्रता नष्ट हो जाती थी और वह फिर शुद्ध व्यक्ति समाज में मिलने-जुलने के योग्य हो जाता था। किंतु इस विशाल संख्या की छुआछूत जन्म, मृत्यु आदि की अशुचिता से सर्वथा भिन्न है। यह आजीवन है जो हिंदू उनका स्पर्श करते हैं वे स्नानादि के द्वारा पवित्र हो सकते हैं किन्तु ऐसी कोई चीज नहीं जो अछूत को पवित्र बना सके। वे अपवित्र ही पैदा होते हैं और वे जन्म भर अपवित्र बने रहते हैं। वे अपवित्र ही बने रहकर मर भी जाते हैं और जिन बच्चों को जन्म देते हैं वे बच्चे भी अपवित्रता का कलंक माथे पर लगाए, पैदा होते हैं। यह एक स्थायी जन्म जन्मान्तर कलंक है जो किसी तरह धुल नहीं सकता।
तीसरी बात यह है कि अहिन्दू जो अशुद्धता से पैदा होने वाले पार्थक्य को मानते थे, वे उन व्यक्तियों को अथवा उनसे निकट सम्पर्क रखने वालों को ही पृथक करते थे। लेकिन हिन्दुओं को इस छुआछूत ने एक वर्ग के समूचे वर्ग को अस्पृश्य बना रखा है। एक वर्ग जिसकी जनसंख्या आज पांच-छः करोड़ है।
चौथी बात यह है कि अहिन्दू उन व्यक्तियों को जो अपवित्रता से प्रभावित हो गए हों कुछ समय के लिए पृथक भले ही कर देते थे। वे उन्हें एकदम पृथक बसा नहीं देते थे। हिंदू समाज का आदेश है कि सब अछूत पृथक बसें। हिंदू अछूतों की बस्ती में नहीं रहेगा और वह अछूतों को अपनी बस्ती में रहने भी नहीं देगा। हिंदू छुआछूत को मानते हैं उसका वह महत्त्वपूर्ण अंग है। यह सामाजिक बहिष्कार मात्र नहीं है, थोड़े समय के लिए सामाजिक व्यवहार का बंद कर देना भी नहीं है। यह तो मुकम्मल क्षेत्रीय पार्थक्य (अलगाव) का उदाहरण है, अछूतों को एक कांटेदार तार के घेरे में अर्थात् एक पिंजरे में बंद कर देना है। हर हिंदू गांव में अछूतों के टोले हैं। हिंदू गांव में रहते हैं, अछूत गांव से बाहर टोले में बसते हैं।
ऐसी है यह हिंदू छुआछूत व्यवस्था, इससे कौन इंकार कर सकता है कि जो बुराई अहिन्दुओं में विद्यमान है वह उससे सर्वथा भिन्न नहीं है। यह निर्विवाद है कि हिंदुओं की छुआछूत एक बेमिसाल ही व्यवस्था है। अहिन्दू समाज में भी लोगों को