अध्याय 3
अछूत गांव के बाहर क्यों रहते हैं?
अछूत गांव के बाहर क्यों रहते हैंµयह इतना निंदनीय तथ्य है कि जिन लोगों को इस बारे में बहुत अधिक जानकारी नहीं है वे भी इसका इतना तो संज्ञान करते ही हैं अथवा उन्हें इतना तो मालूम ही है। फिर भी किसी व्यक्ति ने यह नहीं सोचा कि यह एक गंभीर मामला है जिसका संतोषजनक समाधान होना चाहिए। यह कैसे हुआ कि अछूत गांव के बाहर रहने लगे? क्या उन्हें पहले अछूत घोषित किया गया और फिर उन्हें गांव से बाहर निकाला गया और उन्हें बाहर रहने के लिए बाध्य किया गया? अथवा वे क्या पहले से ही गांव के बाहर रहते थे, और उन्हें कालांतर में अछूत घोषित कर दिया गया? यदि हमारा यह उत्तर हो कि वे पहले से ही गांव के बाहर रहते थे तो अगला प्रश्न यही होता है कि उसका कारण क्या हो सकता है?
चूंकि अछूतों के अलग आवास होने के प्रश्न पर पहले कभी किसी ने विचार ही नहीं किया, इसलिए स्वाभाविक तौर पर इस बारे में किसी का कुछ सिद्धांत नहीं है कि अछूत गांव के बाहर क्यों रहने लगे। यह तो हिंदू शास्त्रों का मत है और यदि कोई इसे सिद्धांत मानकर उचित कहें तो वह कह सकता है। शास्त्र कहते हैं कि अंत्यजों को गांव के बाहर रहना चाहिए और उनकी बस्ती गांव के बाहर होनी चाहिए।
उदाहरण के लिए मनु का कथन हैःµ
10.51. फ्चाण्डालों और खपचों का निवास गांव से बाहर हो। उन्हें अपपात्र बनाया
जाए। उनका धन कुत्ते और गधे हों।य्
10.52. फ्मुदों के उतरन (कफन) उनके वस्त्र हों वे फूटे बर्तनों में भोजन करें।
उनके गहने काले लोहे के हों और वे सदैव जगह-जगह घूमते रहें।य्
10.53. फ्धर्म धारण करता हुआ मनुष्य उनसे किसी प्रकार का सरोकार न रखे।
उन्हें देखें भी नहीं। वे आपस में ही अपना सब व्यवहार रखें और वे
अपने विवाह भी अपनी बराबरी वालों के साथ करें।य्