क्या ऐसे समानान्तर मामले हैं?
गए थे? श्री सीभोम ने इस पृथकता का कारण इस प्रकार बताया है ख्2, ःµ
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यकायक देखने पर वेल्स के प्राचीन कानूनों में जिन कबायली लोगों तथा दूसरे कबीले के मानव वर्गों का उल्लेख है उनमें गोरखधंधा मालूम होता है। यह पहेली तभी हल होती है जब उस कबीले के गठन का बुनियादी नियम समझ में आ जाए। इसे विजय और भूमि की स्थायी व्यवस्था की उलझनों से और विदेशी कानून, रीति-रिवाज और नामावली के आक्रमणों से अलग रखा जाए। यह सिद्धांत ऊपरी दृष्टि से एकदम सरल लगता है। इसमें कोई संदेह नहीं कि कबीलों का मूलभूत सिद्धांत स्वतंत्र कबीलों का आपसी रक्त संबंध पर आधारित था, कुछ भी हो, जो संबंधी न हो, वह कबीले का नहीं हो सकता था। फ्कबीलाय् भी वास्तव में वेल्स के संबंधियों का एक समूह ही था। आमतौर पर वेल्स की कबीलाई पद्धति में दो वर्ग थेµवेल्स रक्त वाले और भिन्न रक्त वाले। भूमि व्यवस्था अथवा विजय की किसी बात से एकदम असम्बद्ध इन दोनों दलों में यदि इसे अनुलंघनीय भी माना जाए तो भी एक बहुत ही चौड़ी खाई थी। यह था रक्त का भेद और यह शीघ्र ही स्पष्ट हो जाता है कि जिस उद्देश्य से इस भेद को बनाए रखा गया है वह कबीलाई पद्धति का एक विशेष प्रतीक है और साथ ही उसकी शक्ति का एक छिपा हुआ रहस्य भी।
आदिम काल में आयरलैंड और वेल्स के गांवों की संरचना के इस वर्णन से स्पष्ट हो जाता है कि भारत के अछूत ही अकेले ऐसे नहीं हैं जो गांव से बाहर रहते हों। इससे सिद्ध होता है कि यह एक सर्वव्यापी परम्परा थी और इसकी निम्नलिखित विशेषताएं थीं µ
(1) आदिम युग में गांव की बस्तियां दो हिस्सों में विभाजित थीं। एक हिस्से
में एक कबीले के लोग रहते थे और दूसरे में दूसरे कबीलों के छितरे हुए
लोग रहते थे।
(2) बस्ती का वह भाग जहां मूल कबीले के लोग रहते थे, गांव कहलाता था।
छितरे हुए लोग गांव के बाहर रहते थे।
(3) छितरे लोगों को गांव से बाहर करने का कारण यह था कि वे पराये थे
और उनका इस कबीले से कोई संबंध नहीं था।
भारत के अछूत और आयरलैंड के फयुदहिर और वेल्स के अल्त्यूर्द के उदाहरण में पूरा तालमेल है। जिस कारण से आयरलैंड में फयूदहिर और वेल्स में अल्त्युद लोगों को गांव से बाहर रहना पड़ता था, उसी कारण से भारत के अछूत गांवों से बाहर रहते आए हैं। इससे यह बात स्पष्ट है कि अछूतों के गांव के बाहर रहने के बारे में जो कुछ कहा गया है उसके उदाहरण अन्यत्र भी विद्यमान हैं।