6. छितरे लोगों की अलग बस्तियां अन्यत्र कैसे विलुप्त हो गईं? - Page 67

52 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाड्ख्.,मय

नियम को कुलीनता का नियम कहते थे। यह वही नियम था कि यदि पीढ़यों की निश्चित संख्या तक कोई बाह्य समाज से सटा हुआ रहे अथवा उस वर्ग में विवाह कर ले तो वह उनका संबंधी हो सकता है। श्री सीभोम ने वेल्स की ग्राम पद्धति में एक वर्ग के बाह्य वर्ग का सदस्य बन जाने के जो नियम थे, उन्हें इस प्रकार दिया हैःµ

(1) दक्षिण वेल्स की अनुश्रुति के अनुसार सिमरू (वेल्स) में रहना गैर लोगों

को अन्ततः सिमरू बना देती है। लेकिन तभी जब वह कम से कम 9

पीढि़यां रहे।

(2) साइमरे के अनुसार पीढ़ी दर पीढ़ी अंतर विवाह होते रहने से चौथी पीढ़ी

में किसी अन्य का वंशज सिमरू हो जाता है। दूसरे शब्दों में मूल रूप से

किसी पराए का प्रपौत्र जिसका रक्त 8 हिस्सों में कम से कम सात हिस्से

सिमरू हो चुका है, कबीले के आदमियों के अधिकारों का अधिकारी हो

जाता है।

क्या ऐसा भारत में नहीं होना चाहिए था? यह हो सकता था। वास्तव में इसे होना चाहिए था, क्योंकि आयरलैंड और वेल्स के समान एक नियम भारत में भी था। मनु ने इसका उल्लेख भी किया है। दसवें अध्याय के 64 से 67 तक के श्लोकों में मनु का कथन है कि यदि एक शूद्र सात पीढि़यों तक ब्राह्मण जाति में विवाह करे तो वह ब्राह्मण बन सकता है। चातुर्वर्ण्य का सामान्य नियम था कि एक शूद्र कभी ब्राह्मण नहीं बन सकता। शूद्र पैदा होता था और शूद्र ही मर जाता था। वह कभी ब्राह्मण नहीं बन सकता था। लेकिन यह प्राचीन विधान इतना कठोर था कि मनु को इसे शूद्रों पर लागू करना पड़ा। यह स्पष्ट है कि यदि यह भारत में जारी रहता तो भारत छितरा समुदाय गांव की बस्तियों में घुल जाता और उसकी पृथक बस्तियां न रहतीं।

ऐसा क्यों नहीं हुआ? इसका उत्तर यही है कि छुआछूत के विचार से पलड़ा भारी हो गया और इससे संबंधी तथा असंबंधी कबीलों और बाहरी होने के भेद अर्थात् छूत और अछूत के भेद को एक-दूसरे रूप में सनातन बना दिया। यह नई चीज आ गई जिसने आयरलैंड और वेल्स का सा ताल-मेल भारत में नहीं होने दिया। इसका परिणाम यह हुआ कि आज हर गांव में एक पृथक बस्ती होना भारतीय गांव का एक आवश्यक अंग हो गया है।