छुआछूत की व्यवसाय जन्य उत्पत्ति
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यह परिवर्तन दास प्रथा का पुनर्संगठन मात्र था और उस क्रमागत असमानता का आधार जो चातुर्वर्ण्य की आत्मा है इसे ठोस रूप में व्यक्त करें तो इस नियम का तात्पर्य यह हुआ कि एक ब्राह्मण, एक क्षत्रिय, एक वैश्य तथा एक शूद्र ब्राह्मण का दास हो सकता था।
क्षत्रिय, वैश्य तथा शूद्र क्षत्रिय का दास हो सकता है। वैश्य और शूद्र वैश्य का दास हो सकता है। किंतु शूद्र का दास केवल शूद्र ही हो सकता है। यह सब होने पर दास प्रथा कानून प्रचलित रहा। ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य तथा शूद्र कोई भी हो यदि वह दास बनता तो उस पर वह नियम लागू ही होता।
दासों के लिए निश्चित हुए कर्तव्य की ओर ध्यान दें तो यह परिवर्तन किसी तरह का भी परिवर्तन नहीं है। उनका अब भी यही मतलब रखा कि यदि एक ब्राह्मण दास बने, एक क्षत्रिय दास बने, एक वैश्य दास बने अथवा एक शूद्र दास बने तो उसे झाड़ू लगाने का काम करना ही होगा। हां, एक ब्राह्मण किसी क्षत्रिय, वैश्य अथवा शूद्र के घर में झाड़ू नहीं लगाएगा। किंतु वह एक ब्राह्मण के घर भंगी का काम करेगा, वह एक शूद्र के घर में नहीं करेगा। इसलिए यह स्पष्ट है कि ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य जो निश्चित रूप से आर्य हैं, गंदे से गंदा भंगी का काम करते हैं। यदि भंगी का काम एक आर्य के लिए घृणित कार्य नहीं था तो यह कैसे कहा जा सकता है कि गंदे पेशों को करना छुआछूत का कारण है। इसलिए यह सिद्धांत कि गंदे पेशे में लगना अस्पृश्यता है, निराधार सिद्ध होता है।