8. छुआछूत की व्यवसाय जन्य उत्पत्ति - Page 89

74 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाड्ख्.,मय

(5) दरवाजे, शौचालय, सड़क तथा कूड़ा फेंकने की जगह पर झाड़ू लगाना,

शरीर के गुह्य अंगों का मर्दन, उच्छिष्ट भोजन तथा मल-मूत्र को इकट्ठा

कर फेंकना।

(6) और अंत में जब स्वामी चाहे तो उसके अंगों की मालिश करना। यह काम

गंदे (अपवित्र) माने जाने चाहिए। इनके अतिरिक्त शेष सभी काम पवित्र

हैं।

  1. इस प्रकार शुद्ध काम करने वाले चार प्रकार के सेवकों की गिनती करा दी गई है। दूसरे जो घिनौना कार्य करते हैं दास हैं और वे पन्द्रह प्रकार ख्1, के हैं।

यह स्पष्ट है कि गंदा काम करने वाले दास थे और झाड़ू लगाना गंदे काम में शामिल था। प्रश्न उठता है दास कौन थे? क्या वे आर्य थे अथवा अनार्य? इसमें कोई संदेह नहीं कि आर्यों में दास प्रथा थी। एक आर्य दूसरे आर्य का दास हो सकता था। चाहे आर्य किसी भी वर्ग का हो वह दास हो सकता था। एक क्षत्रीय दास हो सकता था। एक वैश्य भी, एक ब्राह्मण भी दास हो सकने की संभावना से सर्वथा मुक्त न था। जब देश में चातुर्वर्ण्य एक कानून की तरह प्रचलित हुआ तो दास प्रथा में कुछ परिवर्तन आया। नारदस्मृति के निम्नलिखित उद्धरणों से उस परिवर्तन का रूप स्पष्ट हो जाता हैःµ

  1. फ्चारों वर्णों के प्रतिलोम क्रम में दास प्रथा के लिए स्थान नहीं यदि आदमी अपने वर्ण धर्म का पालन न करे तो वह इस नियम का अपवाद है। उस अवस्था में दासत्व पत्नी की स्थिति के समान हैय्। याज्ञवल्क्य भी कहता हैःµ

183 (2) फ्दास प्रथा वर्ण व्यवस्था के अनुलोम क्रम से है प्रतिलोम क्रम से नहीं।य् याज्ञवल्क्य स्मृति पर विज्ञानेश्वर की मिताक्षरी नामट टीका में इसकी व्याख्या इस तरह की गई हैःµ

फ्ब्राह्मणों और शेष वर्णों में दास प्रथा अनुलोम क्रम में रहेगी क्षत्रिय और शेष सभी ब्राह्मण के दास हो सकते हैं। वैश्य और शूद्र क्षत्रिय के दास हो सकते हैं। शूद्र, वैश्य का दास हो सकता है। यह दास प्रथा अनुलोम क्रम से ही लागू हो सकती है।य्

  1. नारद स्मृति में दासों के वर्ण की व्याख्या निम्नांकित मंत्रों में की गई हैः-

5.26. अपने स्वामी के घर जन्मा, उपहार में प्राप्त, विरासत में प्राप्त, दुर्भिक्ष में पोषित, किसी वैद्य स्वामी

द्वारा प्रदत्त।

5.27. भारी भरण से मुक्त कराया गया, युद्ध बंदी, युद्ध में विजित फ्मैं तेरा हूंय् कह कर आया हुआ,

धर्म त्यागी, सावधि दास।

5.28. भरण पोषण के लिए बना दास, दासी-संबंधों के कारण बना दास, स्वविक्रेता। विधान में दासों

के ये 15 वर्ग हैं।