पाकिस्तान और सांप्रदायिक शांति
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बंगाल में मुस्लिमों की संख्या 2,74,97,624 है और हिंदुओं की 2,15,70,407। इस तरह दोनों में केवल 59,27,217 का अंतर है। इसका अर्थ है कि बंगाल में मुस्लिम बहुमत केवल 12 प्रतिशत का है। इन तथ्यों को देखते हुए क्या बेहतर है - नया सीमांकन न करके पूर्वी बंगाल और सिलहट में मुस्लिम कौमी राज्य बनाने का विरोध करना और केवल 12 प्रतिशत बहुमत वाले मुस्लिमों को 44 प्रतिशत हिंदू अल्पसंख्यकों पर शासन करने देना, या फिर नए सीमांकन को स्वीकृति देकर मुस्लिमों और हिंदुओं को अलग-अलग कौमी रियासतों में रखकर 44 प्रतिशत हिंदुओं को मुस्लिम शासन के डरावने कारनामों से मुक्त रखना?
बंगाल और पंजाब के हिंदुओं को यह सोचना चाहिए कि उन्हें कौन से विकल्प को तरजीह देनी है। मुझे लगता है कि अब वह समय आ गया है जब बंगाल और पंजाब के ऊंची जातियों के हिंदुओं को बता देना चाहिए कि यदि वे पाकिस्तान का विरोध सिर्फ इसलिए कर रहे हैं कि इससे उनके लिए रोजगार कम हो जाएंगे तो वे सबसे भयंकर भूल कर रहे हैं। अपने हाथों में स्थान और ताकत का एकाधिकार रखने के दिन अब लद चुके हैं। राष्ट्रीयता के नाम पर वे नीची जातियों के हिंदुओं को धोखा दे सकते हैं, परंतु मुस्लिम प्रांतों में मुस्लिम बहुमत को धोखा देकर स्थान और सत्ता पर अपना एकाधिकार नहीं बनाए रख सकते। यदि पाकिस्तान के विरुद्ध हिंदुओं के चीत्कार को उनके इस संकल्प में देखा जाए कि वे मुस्लिम बहुमत के अंतर्गत रह लेंगे और आत्मनिर्णय का विरोध करेंगे, तो यह सचमुच एक बहुत ही साहसपूर्ण बात होगी। परंतु हिंदुओं का यह विश्वास करना कोई बुद्धिमानी नहीं होगी कि मुसलमानों को मूर्ख बनाकर वे अपना स्थान और सत्ता बनाए रख सकेंगे। जैसा कि लिंकन ने कहा था - यह संभव नहीं है कि तमाम लोगों को हर समय मूर्ख बनाए रखा जाए। यदि हिंदू लोग मुस्लिम बहुमत के अंतर्गत रहने का चुनाव करते हैं तो इस बात की संभावना है कि वे सब कुछ खो बैठें। दूसरी ओर, यदि बंगाल और पंजाब के हिंदू अलग होना स्वीकार कर लें तो यह तो सच है कि उन्हें अधिक नहीं मिलेगा, परंतु यह निश्चित है कि वे सब कुछ नहीं खो बैठेंगे।