9. विदेशों से सीख - Page 226

अध्यायः 10

सामाजिक निष्क्रियता

हिंदू समाज के दोषों को व्यक्त करने वाली सामाजिक बुराइयां सर्वविदित हैं। मिस मेयो द्वारा प्रकाशित ‘मदर इंडिया’ में इन बुराइयों का विस्तार से विवेचन किया गया है। परंतु ‘मदर इंडिया’ ने जहां इन बुराइयों को उजागर करने का सोद्देश्य कार्य किया है और इनके प्रवर्तकों को विश्व न्याय मंच के सामने अपने पापों का उत्तर देने के लिए आहूत किया है, उससे दुर्भाग्यवश विश्व में यह धारणा भी बनी है कि जबकि हिंदू इन सामाजिक बुराइयों की कीचड़ में फंसकर पतोन्मुख हो रहे हैं, वहां भारतीय मुसलमान उनसे मुक्त हैं और हिंदुओं की तुलना में अधिक प्रगतिशील हैं। ऐसी धारणा का बनना उन लोगों के लिए आश्चर्यजनक ही है जो भारत में मुस्लिम समाज को बहुत पास से जानते हैं।

कोई भी यह प्रश्न पूछ सकता है कि क्या कोई ऐसी सामाजिक बुराई है जो हिंदुओं में तो है, लेकिन मुसलमानों में नहीं पाई जाती?

बाल-विवाह को ही लें। अखिल भारतीय महिला सम्मेलन (ऑल इंडिया वूमेंस कांफ्रेंस) द्वारा गठित बाल-विवाह विरोधी समिति ने एक समाचार बुलेटिन प्रकाशित किया है, जिसमें देश के विभिन्न समुदायों में प्रचलित बाल-विवाह की स्थिति का विस्तार से ब्यौरा दिया गया है। 1931 की जनगणना रिपोर्ट से जो आंकड़े लिए गए हैं, वे यहां प्रस्तुत हैंः

तालिका

0-15 के आयु वर्ग में प्रति 1000 महिलाओं में

विवाहित महिलाएं

o"kZ fganw eqfLye tSu fl[k bZlkbZ
1881
1891
1901
1911
1921
1931
208
193
186
184
170
199
153
141
131
123
111
186
189
172
164
130
117
125
170
143
101
88
72
80
33
37
38
39
32
43