अध्यायः 10
सामाजिक निष्क्रियता
हिंदू समाज के दोषों को व्यक्त करने वाली सामाजिक बुराइयां सर्वविदित हैं। मिस मेयो द्वारा प्रकाशित ‘मदर इंडिया’ में इन बुराइयों का विस्तार से विवेचन किया गया है। परंतु ‘मदर इंडिया’ ने जहां इन बुराइयों को उजागर करने का सोद्देश्य कार्य किया है और इनके प्रवर्तकों को विश्व न्याय मंच के सामने अपने पापों का उत्तर देने के लिए आहूत किया है, उससे दुर्भाग्यवश विश्व में यह धारणा भी बनी है कि जबकि हिंदू इन सामाजिक बुराइयों की कीचड़ में फंसकर पतोन्मुख हो रहे हैं, वहां भारतीय मुसलमान उनसे मुक्त हैं और हिंदुओं की तुलना में अधिक प्रगतिशील हैं। ऐसी धारणा का बनना उन लोगों के लिए आश्चर्यजनक ही है जो भारत में मुस्लिम समाज को बहुत पास से जानते हैं।
कोई भी यह प्रश्न पूछ सकता है कि क्या कोई ऐसी सामाजिक बुराई है जो हिंदुओं में तो है, लेकिन मुसलमानों में नहीं पाई जाती?
बाल-विवाह को ही लें। अखिल भारतीय महिला सम्मेलन (ऑल इंडिया वूमेंस कांफ्रेंस) द्वारा गठित बाल-विवाह विरोधी समिति ने एक समाचार बुलेटिन प्रकाशित किया है, जिसमें देश के विभिन्न समुदायों में प्रचलित बाल-विवाह की स्थिति का विस्तार से ब्यौरा दिया गया है। 1931 की जनगणना रिपोर्ट से जो आंकड़े लिए गए हैं, वे यहां प्रस्तुत हैंः
तालिका
0-15 के आयु वर्ग में प्रति 1000 महिलाओं में
विवाहित महिलाएं
| o"kZ | fganw | eqfLye | tSu | fl[k | bZlkbZ |
|---|---|---|---|---|---|
| 1881 1891 1901 1911 1921 1931 |
208 193 186 184 170 199 |
153 141 131 123 111 186 |
189 172 164 130 117 125 |
170 143 101 88 72 80 |
33 37 38 39 32 43 |