218 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाङ्मय
क्या बाल-विवाह की दृष्टि से मुसलमानों की स्थिति हिंदुओं से बेहतर मानी जा सकती है?
महिलाओं की स्थिति को लीजिए। मुसलमान इस बात पर जोर देते हैं कि मुस्लिम महिलाओं को मिले कानूनी अधिकार अन्य महिलाओं, उदाहरणार्थ हिंदू महिलाओं को प्राप्त अधिकारों की तुलना में अधिक आजादी सुनिश्चित करते हैं और वे कतिपय पाश्चात्य देशों की महिलाओं को प्रदत्त अधिकारों की तुलना में भी अधिक हैं। यह दावा मुस्लिम कानून के कुछ प्रावधानों को लेकर किया जाता है।
सर्वप्रथम यह कहा जाता है कि मुस्लिम कानून में विवाह के लिए कोई आयु-सीमा निर्धारित नहीं की गई है, और लड़की के इस अधिकार को मान्यता दी गई है कि वह किसी भी समय विवाह कर सकती है। फिर, उस स्थिति के अलावा जबकि विवाह पिता अथवा पितामह ने कराया है, बाल्यावस्था में अन्य विवाहित मुस्लिम लड़की योवनावस्था प्राप्त कर लेने पर अपने विवाह का परित्याग कर सकती है।
दूसरे यह विश्वास किया जाता है कि मुसलमानों में विवाह एक अनुबंध है। अनुबंध होने के कारण पति अपनी पत्नी को तलाक दे सकता है। मुस्लिम कानून ने पत्नी को भी पर्याप्त संरक्षण प्रदान किया है। यदि वह उसका उपयोग करे तो तलाक के मामले में पुरुष की बराबरी कर सकती है। यह दावा किया जाता है कि मुस्लिम कानून के तहत, विवाह के समय अथवा कतिपय मामलों में उसके बाद भी, पत्नी ऐसा अनुबंध कर सकती है जिसके द्वारा वह कतिपय परिस्थितियों के तहत तलाक हासिल कर सकती है।
तीसरे, मुस्लिम कानून में यह व्यवस्था है कि पत्नी अपने को समर्पित करने के एवज में धन अथवा संपत्ति पति से मांग सकती है, जिसे उसके ‘मेहर’ के तौर पर जाना जाता है। मेहर (एक प्रकार का दहेज) का निर्धारण विवाह के बाद भी किया जा सकता है, और यदि कोई राशि निर्धारित नहीं की गई है तो भी पत्नी समुचित मेहर की हकदार है। मेहर की राशि को सामान्यतः दो भागों में विभाजित किया जाता है। इसमें एक को ‘फौरी’ कहा जाता है जो मांग करने पर तुरंत देय होती है, और दूसरी है ‘मुद्दती’ जो मृत्यु अथवा तलाक से शादी के टूटने पर देय होती है। मेहर के लिए पत्नी का दावा पति की संपत्ति पर एक प्रकार का ऋण माना जाता है। उसका अपने मेहर पर पूर्ण अधिकार होता है, जिसका मकसद उसे आर्थिक स्वतंत्रता प्रदान करना है। वह अपनी इच्छानुसार उक्त मेहर का परित्याग कर सकती है अथवा उसकी आय को विनियोजित भी कर सकती है।