10. सामाजिक निष्क्रियता - Page 254

अध्यायः 11

साम्प्रदायिक आक्रामकता

एक सतही पर्यवेक्षक भी यह समझने में चूक नहीं करेगा कि मुसलमानों के प्रति हिन्दुओं और हिन्दुओं के प्रति मुसलमानों का आक्रामक रवैया ही उनके दृष्टिकोण को दर्शा देता है। हिन्दुओं का आक्रामक रवैया एक नया चरण है, जिसका विकास हाल ही में होना शुरू हुआ है। मुसलमानों का आक्रामक रवैया उनका जातीय चरित्र है और हिन्दुओं की तुलना में प्राचीन भी है। ऐसा नहीं है कि यदि अवसर दिया जाए तो हिन्दू गति नहीं पकड़ लेंगे और मुसलमानों को पीछे नहीं छोड़ देंगे। परन्तु वर्तमान में तो इस आक्रामक मनोभाव के प्रदर्शन से मुसलमान ही हिन्दुओं को बहुत पीछे छोड़ चुके हैं।

साम्प्रदायिक दंगों से सम्बन्धित खण्ड में मुसलमानों के सामाजिक आक्रमण के बारे में काफी कुछ कहा जा चुका है। मुसलमानों की राजनीतिक आक्रामकता के बारे में संक्षेप में कुछ चर्चा करना आवश्यक है। क्योंकि उनके राजनीतिक अतिक्रमणों ने जो विकार उत्पन्न कर दिए है, उन्हें नज़रअन्दाज नहीं किया जा सकता।

मुसलमानों की इस राजनीतिक आक्रामकता की तीन बातें ध्यान देने योग्य हैं।

पहली बात यह है कि मुसलमानों की राजनीतिक मांगें हनुमानजी की पूंछ की तरह बढ़ती जा रही हैं। उनकी मांगों का समारम्भ 1892 से होता है।

1885 में फ्भारतीय राष्ट्रीय कांगे्रसय् की स्थापना की गयी थी। स्वराज्य के बजाए एक अच्छे प्रशासन की मांग को लेकर इसे शुरू गया था। ब्रिटिश सरकार ने इस मांग की प्रतिक्रियास्वरूप 1861 के विधान के तहत केन्द्रीय और प्रान्तीय विधायिकाओं के स्वरूप में बदलाव लाने की आवश्यकता महसूस की। कांगे्रसी आंदोलन के अभी शैशवावस्था में रहने के कारण, ब्रिटिश सरकार ने, विधायिका सभाओं को जन-प्रातिनिधिक बनाने की आवश्यकता नहीं समझी। उसने उन्हें केवल प्रातिनिधिक होने की आभा से मण्डित