10. सामाजिक निष्क्रियता - Page 255

246 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाङ्मय

करने का ही विचार किया। तदनुसार, 1892. ई. में ब्रिटिश संसद ने भारत परिषद् अधिनियम फ्(इण्डियन काउन्सिल्स एक्ट)य् पारित किया। यह अधिनियम दो बातों के लिए याद किया जाएगा। 1892 ई. के अधिनियम में, पहली बार, जन प्रतिनिधित्व के आधार पर विधायिकाओं के गठन करने के सिद्धांत से सादृश्य सिद्धांत को प्रतिपादित किया गया। यह निर्वाचन का सिद्धांत नहीं था। यह मनोनयन का सिद्धांत था, परन्तु इसमें व्यवस्था यह की गयी कि मनोनयन से पूर्व उस मनोनीत होने वाले प्रतिनिधि का महत्वपूर्ण जन संस्थाओं, व्यवसायी संघों आदि जैसे नगरपालिकों, जिला बोर्डों, विश्वविद्यालयों, के द्वारा चयन होना चाहिए। दूसरी बात, भारत के राजनीतिक विधान में मुसलमानों के लिए अलग प्रतिनिधित्व का सिद्धांत सर्वप्रथम इसी अधिनियम के अंतर्गत स्थापित विधायिकाओं के गठन में प्रयुत्तQ किया गया।

इस सिद्धांत के प्रतिपादन पर रहस्यों का आवरण पड़ा हुआ है। यह इसलिए रहस्यमय है कि इसका समावेश बहुत चुपचाप किया गया। इस अधिनियम में अलग प्रतिनिधित्व का कोई प्रावधान नहीं किया गया है, इस सम्बन्ध में अधिनियम चुप है। यह तो उन दिशानिर्देशों में, न कि अधिनियम में, शामिल किया गया था जो उन व्यक्तियों को दिए गये थे जिनके द्वारा विधायिकाओं में विभिन्न वर्गों और हितों का प्रतिनिधित्व निश्चित किया जाना था तथा उत्तQ निर्देशों में, प्रतिनिधित्व प्रदान करने के लिए मुसलमानों को एक वर्ग मानने के लिए कहा गया था।

दिशानिर्देशन में इसके समावेश के लिए कौन उत्तरदायी था, यह रहस्य है। अलग प्रतिनिधित्व की यह योजना किसी मांग का परिणाम नहीं थी। ऐसी मांगों को मुसलमानों के किसी संगठन ने पेश भी नहीं किया था। तब, उसकी शुरुआत किससे हुई? ऐसा संकेत मिलता है कि वायसराय लार्ड डफरिन इसका प्रणेता था जिसने 1888 में ही, जब वह विधायिकाओं में प्रतिनिधित्व के प्रश्न को देख रहा था, इस बात पर बल दिया था कि भारत में हितों के आधार पर प्रतिनिधित्व दिए जाने की आवश्यकता होगी, तथा जिस प्रकार इंग्लैण्ड में प्रतिनिधित्व प्राप्त किया जाता है उसे यहाँ प्रचलित नहीं किया जा सकता। कुतूहल इससे आगे इस प्रश्न को उठाने के लिए बाध्य करता है कि आखिर लार्ड डफरिन द्वारा हित आधारित प्रतिनिधित्व की योजना प्रस्तुत करने के पीछे कौन से कारण रहे होंगे। ऐसा बताया जाता है कि ‘कांगे्रस’ से, जिसकी तीन वर्ष पूर्व स्थापना हो चुकी थी, मुसलमानों को विमुख करने के लिए यह किया गया था। अब सत्य जो भी रहा हो, किन्तु इतना सुनिश्चित है कि सर्वप्रथम इसी अधिनियम के द्वारा मुसलमानों का अलग प्रतिनिधित्व भारतीय संविधान की एक विशेषता बन गया। फिर भी यह ध्यान में रखना चाहिए कि इस अधिनियम ने या इसके नियामकों