10. सामाजिक निष्क्रियता - Page 256

साम्प्रदायिक आक्रामकता

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ने मुस्लिम सम्प्रदाय को प्रतिनिधियों के चयन का अधिकार नहीं दिया और न ही मुस्लिमों को इसने यह अधिकार प्रदान किया कि वे प्रतिनिधित्व में किसी निर्धारित संख्या की मांग करें। इसने बस इतना ही किया कि मुसलमानों को अलग प्रतिनिधित्व का अधिकार प्रदान किया।

यद्यपि अलग प्रतिनिधित्व का सुझाव सर्वप्रथम अंगे्रजों के द्वारा दिया गया, तथापि अलग राजनीतिक अधिकारों के सामाजिक महत्व को समझने में मुसलमानों ने चूक नहीं की। इसका यह परिणाम हुआ कि 1909 में जब मुसलमानों को यह जानकारी मिली कि विधान परिषदों में सुधार विचाराधीन हैं तो उन्होंने अपनी ही उत्पे्ररणा से वायसराय लार्ड मिंटो के समक्ष अपना प्रतिनिधिमण्डलऽ भेजा तथा वायसराय के समक्ष निम्नलिखित मांगें रखींः

  1. नगरपालिकाओं और जिला परिषदों में उन्हें अपनी संख्या, सामाजिक स्थिति तथा

स्थानीय प्रभाव के आधार पर प्रतिनिधित्व दिया जाए।

  1. विश्वविद्यालयों के शासी निकायों में मुसलमानों के प्रतिनिधित्व का आश्वासन

दिया जाए।

  1. प्रांतीय परिषदों में साम्प्रदायिक प्रतिनिधित्व के लिए मुसलमान ज़मीदारों, वकीलों

और व्यापारियों तथा अन्य हितों के समूहों के प्रतिनिधियों, विश्वविद्यालय

स्नातकों तथा जिला परिषदों और नगरपालिकाओं के सदस्यों से गठित विशेष

निर्वाचन-मंडलों द्वारा चुनाव की व्यवस्था की जाए।

  1. इम्पीरियल लेजिस्लेटिव कौंसिल में मुसलमान प्रतिनिधियों की संख्या उनकी

जनसंख्या पर नहीं आधारित होनी चाहिए और किसी भी परिस्थिति में मुसलमानों

को निष्प्रभावी अल्पमत में नहीं रखना चाहिए। प्रतिनिधियों का, यथासंभव, निर्वाचन

ही (मनोनयन के बजाय) होना चाहिए तथा ऐसे निर्वाचन के लिए, जमीदारों,

वकीलों, व्यापारियों, प्रांतीय परिषदों के सदस्यों तथा विश्वविद्यालयों के शासी

निकायों के सदस्यों से गठित अलग मुस्लिम निर्वाचक-मंडल को आधार बनाया

जाए।

1909 के अधिनियम में इन मांगों को स्वीकार करते हुए, प्रावधान कर दिया गया। इस अधिनियम के अंतर्गत मुसलमानों को निम्न प्रकार के अधिकार दे दिए गए-

(1) अपने प्रतिनिधियों को निर्वाचित करने का अधिकार (2) अपने प्रतिनिधियों को अलग निर्वाचन-मंडल द्वारा निर्वाचित करने का अधिकार (3) सामान्य निर्वाचन-मंडलों के अनुसार भी मतदान करने का अधिकार, और (4) प्रतिनिधित्व में वज़न का अधिकार।