साम्प्रदायिक आक्रामकता
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पंजाब तथा मध्य प्रान्त को छोड़कर, अन्यत्र सभी प्रांतों में 1909 ई. के अधिनियम के प्रावधान प्रभावी हुए। पंजाब में मुसलमानों को विशेष संरक्षण दिए जाने की आवश्यकता ही नहीं थी तथा मध्य प्रान्त से उस समय विधान परिषद अस्तित्व में थी ही नहीं।
1916 के अक्तूबर महीने में, इम्पीरियल लेजिस्लेटिव कौन्सिल के उन्नीस सदस्यों ने वायसराय लार्ड चेम्सफोर्ड के समक्ष एक ज्ञापन पेश किया तथा संविधान में सुधार की मांगें कीं। मुस्लिम सम्प्रदाय के लिए अनेक मांगें करते हुए मुसलमान तत्काल आगे आ गए। इनकी मांगें इस प्रकार थीं-
(1) अलग प्रतिनिधि के सिद्धांत को पंजाब और मध्य प्रांत में लागू किया जाना।
(2) प्रांतीय परिषदों और इम्पीरियल लेजिस्लेटिव काउन्सिल में मुसलमान प्रतिनिधियों
की संख्या निर्धारित की जाना।
(3) मुसलमानों के धार्मिक और रीति-रिवाजों के मामलों में, अधिनियमों में उनको
संरक्षण प्रदान किया जाना।
इन मांगों के उपरान्त, विचार-विमर्श द्वारा हिन्दू और मुसलमानों में समझौता हुआ, जिसे फ्लखनऊ पैक्टय् कहा जाता है। इस समझौते के दो खण्ड हैं। एक खण्ड जिसका सम्बन्ध कानून के निर्माण से है उसके अंतर्गत निम्न सहमति हुई-
फ्गैर-सरकारी सदस्य द्वारा प्रस्तुत किसी भी कानून अथवा संकल्प पर, या
उसके किसी खण्ड पर, जिसका प्रभाव किसी एक सम्प्रदाय पर पड़ता है,
(यह प्रश्न सम्बन्धित सम्प्रदायों के सदस्यों को सम्बन्धित विधान परिषदों
में ही निर्णीत करना है) उस विशिष्ट परिषद में, जो या तो इम्पीरियल या
फिर प्रांतीय परिषद हो सकती है, कोई कार्यवाही नहीं की जाएगी जब
तक कि उत्तQ परिषद में, सम्बन्धित सम्प्रदाय के तीन चौथाई या अधिक
प्रतिनिधि, ऐसी कार्यवाही के पक्ष में न हों।य्
दूसरा खण्ड मुस्लिम प्रतिनिधित्व के अनुपात से सम्बन्ध रखता है। इम्पीरियल लेजिस्लेटिव कौन्सिल के संदर्भ में इस समझौते में निम्न प्रावधान हैः
फ्निर्वाचित भारतीय प्रतिनिधियों में एक तिहाई मुस्लिम होंगे जिनका निर्वाचन
विभिन्न प्रान्तों के उनके पृथक मुस्लिम निर्वाचक-मंडलों द्वारा किया जाएगा
तथा उनका अनुपात यथासंभव प्रांतीय विधान परिषदों में उनके प्रतिनिधित्व
के अनुपात के निकट होगा।य्