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साम्प्रदायिक आक्रामकता 253

यह तालिका पूरी तरह यह स्पष्ट नहीं करती कि लखनऊ समझौते के तहत मुसलमानों को कितनी महत्ता प्राप्त हुई। भारत सरकार के द्वारा, लार्ड साउथबौरो की अध्यक्षता वाली मताधिकार समिति के प्रतिवेदन के विषय पर भेजे गए अपने सरकारी पत्र ख्1, में यह तालिका दी गयी है। उसी पत्र से यह तालिका प्राप्त की गई है, जो यह प्रदर्शित करती है कि 1909 में सरकार द्वारा मुसलमानों को प्रदत्त महत्ता से कहीं अधिक महत्ता उन्हें लखनऊ समझौते के अंर्तगत प्राप्त हुई हैः-

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15
15
50
30
76
238
163
349
231
91
214

भारत के संविधान के कार्यकरण की समीक्षा करके अतिरित्तQ सुधारों का सुझाव देने के लिए ब्रिटिश सरकार ने 1927 में साईमन आयोग के गठन की घोषणा की। मुसलमानों ने तुरन्त ही अतिरित्तQ राजनीतिक सुधारों की मांगें पेश की दी। मुस्लिम लीग, अखिल भारतीय मुस्लिम कन्फ्रेंस, ऑल पार्टी मुस्लिम कन्फ्रेंस, जमायत-उल-उलेमा तथा खिलाफत कान्फ्रेंस जैसी अनेक मुस्लिम संस्थाओं द्वारा ये मांगें रखी गयीं। मांगें मुख्य रूप से एक प्रकार की ही थीं। श्री जिन्ना द्वारा मुस्लिम लीग की ओर से जिन मांगों को सूत्रबद्ध किया गया था, यहाँ उनका उल्लेख करना काफी होगा। ख्2,

  1. दिनांक 23 अपै्रल, 1919 का भारतीय संवैधानिक सुधारों (मताधिकार) संबंधी पांचवां शासकीय पत्र

पैरा 2।

  1. ये मांगें जिन्ना के चौदह सूत्र के रूप में जानी जाती हैं। वस्तुतः इनकी कुल संख्या 15 थी और इन्हें

मार्च 1927 में दिल्ली में सभी विचारधाराओं वाले मुस्लिम नेताओं की बैठक में सूत्रबद्ध किया गया था

तथा दिल्ली प्रस्ताव का नाम दिया गया था। जिन्ना के 14 सूत्रों की उत्पत्ति के संबंध में स्पष्टीकरण के

लिए ऑल इंडिया रजिस्टर, 1929, खंड एक, पृष्ट 367 देखिए।